।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल द्वादशी, वि.सं.२०७२, शुक्रवार
पराधीनता और स्वाधीनता


(गत ब्लॉगसे आगेका)
इसी प्रकार यह शरीर जिसे आप ‘मेरा’ और कभी मैंभी कह देते हैं, वर्षोंतक अन्न, जल, वस्त्र आदि दिया, परन्तु एक या दो दिन भी अन्न-जल न दें तो पोल निकाल देगा । काम करना बन्द कर देगा । यह लिहाज नहीं करेगा कि वर्षोंतक अन्न, जल दिया, अब दो दिन नहीं दिया तो कोई बात नहीं । यह इतना कृतघ्न है । आप इसकी गुलामी करते हो; परन्तु यह आपकी गुलामी नहीं करता । यह अपना नहीं है । इसे आप अपना मान लेते हैं‒यह धोखा है । इसपर आपका आधिपत्य नहीं है । अगर आपका आधिपत्य हो तो इसे कमजोरीसे बचा लो । बूढ़ा मत होने दो, बीमार मत होने दो और कम-से-कम मरने मत दो । आप ये कर सकते हो क्या ? यदि नहीं, तो इसे अपना मानना गलती है ।

यह शरीर अपना इस बातमें है कि इससे आपको जो लाभ लेना हो, ले लो । इससे अपना उद्धार, अपना कल्याण कर सकते हो । उद्धार होगा शरीरकी अहंता-ममताके त्यागसे । संसारकी सभी वस्तुएँ केवल त्यागके लिये, दूसरोंकी सेवाके लिये मिली हैं, अपने लिये नहीं । अगर इस बातको मान लें तो महान् शान्ति मिलेगी । ऐसा माननेसे मरनेका भय मिट जायगा और तृष्णा तथा कामना मिट जायगी । कामनाके मिटनेपर दरिद्रता सर्वथा मिट जायगी । परन्तु इन चीजोंको लेते रहोगे तो दरिद्रता बढ़ेगी ।

जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ।

ज्यों-ज्यों वस्तु अधिक होगी, त्यों-त्यों अभाव अधिक होगा । यह बात बड़ी पक्की, सच्ची तथा शास्त्रीय सिद्धान्तकी है । स्थूलरीतिसे भी मनुष्योंको मैंने देखा है कि जब धन कम था, सत्संगमें आते थे । भजन साधन करते थे और कहते थे कि ये धनी आदमी सत्संगमें क्यों नहीं आते । हमारे तो पैसेकी कमी है, खानेको पूरी रोटी नहीं है, फिर भी सत्संगमें आनेका मन रहता है । परन्तु जब उन लोगोंके धन हो गया तो वे भी अब सत्संगमें नहीं आते । यदि उनसे कोई कहे कि सत्संगमें चलो तो कहते है कि इतना काम-धंधा है कि जा नहीं सकते । दूसरे धनवानोंको जो कहते थे, वही दशा उनकी हो गयी । ऐसा हमने देखा है । दूसरी बात है कि पैसा होनेपर आसुरी सम्पदाका लक्षण अभिमान आ जाता है । अभिमानीके प्रति किसीको दया नहीं आती । गरीबके प्रति दूसरोंको दया आ जाती है । धनी व्यक्तिके नौकर भी आपसमें बात करते हैं कि सेठके पास पैसे बहुत हो गये, पर अकल नहीं है । उसका मुँह न देखें, पर क्या करें, पैदा (आमदनी) नहीं है; इस कारण इसके यहाँ नौकरी करनी पड़ती है । नौकर उससे घृणा करते हैं । आप स्वतन्त्र तब हो सकते हैं, जब रुपयोंकी गुलामी न रहे । लाखों, करोड़ों रुपये आपके पास हैं, पर रुपयोंकी गर्मी आपके भीतर न हो, रुपयोंके कारण आपमें अभिमान न हो, तब आप स्वतन्त्र हैं, स्वाधीन हैं । परंतु रुपयोंके रहनेसे स्वाधीन मानना बिलकुल गलती है । परंतु क्या बतावें ? किसको कहें ? कैसे समझावें ?

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‘जीवनका सत्य’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल एकादशी, वि.सं.२०७२, गुरुवार
पद्मा एकादशी-व्रत, श्रीवामनद्वादशी-व्रत
पराधीनता और स्वाधीनता


हमलोग सोचते हैं कि हमारे पास पैसा न होनेसे हम पराधीन हैं । यदि रुपये हो जायँ तो हम स्वाधीन हो जायँ । क्योंकि बिना रुपयोंके जिस चीजको हम खरीदना चाहते हैं, खरीद नहीं सकते । यदि रुपया हो जाय तो हम जो कोई भी चीज खरीदना चाहें तो खरीद लें । परन्तु इसे ठीक प्रकारसे समझना है । यदि आप रुपयोंसे चीज खरीद लेते हैं तो आप स्वाधीन कहाँ हुए ? आप रुपयोंके आधीन हुए । रुपये ‘पर’ हैं ‘स्व’ नहीं, अतः पराधीन हुए । रुपयोंके आधीन रहकर आपको स्वाधीनताका अनुभव होता है, यह गलती है । जैसे रुपयोंके अभावमें पराधीनता है, ऐसे ही रुपयोंके रहते हुए भी पराधीनता है । पहले रुपये नहीं थे वह दुःख था । अब रुपये खर्च हो जायँगे; यह दुःख है । फर्क इतना ही है कि रुपयोंके न रहनेपर पराधीनताका अनुभव होता है, परन्तु रुपयोंके आनेपर ऐसी अंधेरी आती है कि पराधीनताका अनुभव नहीं होता । जिसको पराधीनताका अनुभव होता है, वह पराधीनतासे रहित अर्थात् स्वाधीन हो सकता है । पर जो पराधीन हो और पराधीनताका अनुभव न करता हो, वह स्वाधीन नहीं हो सकता । जबतक आपको प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले प्राकृत पदार्थोंकी चाहना है तबतक आप बिलकुल पराधीन हैं । क्योंकि ये प्राकृत पदार्थ रुपया, धन, शरीर आदि आने-जानेवाले उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं । परन्तु आप रहनेवाले हैं । आप शरीरके उत्पन्न होनेसे पहले भी थे, अब भी हैं और शरीर नष्ट होनेपर भी रहेंगे । अतः यदि आप शरीर, इन्द्रियों, अन्तःकरण आदिके आधीन नहीं होंगे तभी आप स्वाधीन होंगे । इनके आधीन होना तो पराधीन होना है । परमात्मा स्वहै । आप और परमात्मा दोनों रहनेवाले हैं । यदि आप परमात्माके आधीन हो जायँ, उनकी शरण हो जायँ तो स्वाधीन हो जायँगे । क्योंकि परमात्मा ‘स्व’ हैं, अपने हैं । यदि हम प्रभुकी शरण हो जायँ, उनके परायण हो जायँ तो वे कहते हैं

‘मैं भगतन को दास भगत मेरे मुकुट मणि’

भगवान् आपको मालिक बना लेते हैं । अर्जुन भगवान्को कहते हैं कि मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये‒

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथ स्थापय मेऽद्युत ॥
                                               (गीता १ । २१)

भगवान् उसकी आज्ञाका पालन करते है । आप भगवान्के आधीन हो जाते हैं । परन्तु ये रुपये-पैसे जिनके लिये आप झूठ, कपट, बेईमानी, जालसाजी सब कुछ करते हैं, वे जाते समय आपसे पूछेंगे नहीं कि हम जा रहे हैं । चुपके-से खिसक जायँगे । कोई लिहाज नहीं करेंगे ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‘जीवनका सत्य’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल दशमी, वि.सं.२०७२, बुधवार
एकादशी-व्रत कल है (सबका)
आवश्यकता और इच्छा


(गत ब्लॉगसे आगेका)
अब प्रश्र उठता है कि यह ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुख रासी ॥’ होकर बँध कैसे गया ? तो इसका उत्तर है कि यह इसलिये बँधा कि इसने संसारकी इच्छाको मुरव्यता दे दी और परमात्माकी आवश्यकताको भूल गया । यह बात एकदम पक्की और सच्ची है । हमें बहुत-सी बातें पुस्तकोंसे मिली हैं और इसके सिवाय कभी-कभी बातें स्वयं पैदा हो जाती हैं । एक बारकी बात है कि गीताभवन ऋषिकेशमें प्रवचन दे रहा था कि मनमें आया कि ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई’ यह क्या बात है ? जैसे दस रुपयेवालेको सौ रुपयेकी इच्छा होती है, सौ रुपये-वालेको हजारकी इच्छा होती है और हजार मिलनेपर दस हजारकी होती है । तो उत्तर आया कि रुपया स्वीकार करनेसे रुपयेकी इच्छा पैदा हुई । रुपयेका महत्त्व अन्तःकरणमें आया, तब रुपयेकी इच्छा पैदा हुई । यदि रुपयेकी इच्छा न करें, तो इच्छा बढ़ेगी नहीं । ऐसे ही पढ़ाईकी इच्छा उसे होती है जो कुछ पढ़ा-लिखा होगा और पढ़ना चाहता है । जो पढ़ा-लिखा नहीं और पढ़ना नहीं चाहता, उसको पढ़ाईकी चाहना कभी नहीं होती । उसके पढ़ाईकी कमी नहीं है । पढ़े-लिखे आदमीके ही पढ़ाईकी कमी है । इसी प्रकार रुपये-पैसेवालोंके ही रुपयेकी कमी है । जिसके पास रुपया है नहीं और रुपये-पैसोंकी इच्छा नहीं है; उसे रुपयोंकी कमी नहीं खटकती । अतः संसारकी इच्छाके कारण ही अभाव और कमी है । अब प्रश्र है कि इस जड़तासे, इन इच्छाओंसे कैसे छूटें ? तो उत्तर है कि मनुष्यका जड़तासे सम्बन्ध है नहीं, इसने सम्बन्ध मान लिया है । और यह चेतनका जड़के साथ सम्बन्ध ही अनर्थका हेतु है । यह मूल बात है । भगवान्ने मनुष्यको स्वतन्त्रता दी है ।

नरक  स्वर्ग   अपबर्ग   निसेनी ।
ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥

मनुष्य नरक, स्वर्ग और चौरासी लाख योनियोंमें जा सकता है, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति प्राप्त कर सकता है । मनुष्यने उस स्वतन्त्रताका दुरुपयोग किया, इस कारण फँस गया । और यदि अब यह स्वतन्त्रताका सदुपयोग करे, आवश्यकताकी पूर्ति करे और इच्छाओंका त्याग करे, तो बिलकुल ठीक काम हो जाय, इसमें किंचिन्मात्र भी संदेह नहीं ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‘जीवनका सत्य’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल नवी, वि.सं.२०७२, मंगलवार

आवश्यकता और इच्छा


(गत ब्लॉगसे आगेका)
उसकी प्राप्ति वह परम लाभ है कि जिसके बाद और कोई लाभ हो सकता है‒यह माननेमें भी नहीं आता । और जिसमें स्थित होकर मनुष्य गुरुतर दुःखसे भी चलायमान नहीं होता

यं लब्ध्वा चापरं लाभं   मन्यते नाधिक ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
                                                (गीता ६ । २२)

उसकी प्राप्ति होनेपर परम शान्ति तथा परम आनन्द ही रहता है । उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता । मनुष्य इन इच्छाओंके कारण ही दुःख पाता है । ये इच्छाएँ महान् अनर्थका कारण हैं । जबतक यह पृथ्वी रहेगी, आप कितने ही विद्वान् बन जाओ, कितने ही धनवान् बन जाओ, कितने ही बलवान् हो जाओ, कितना ही आदर, मान-सम्मान मिल जाय, आपको इन्द्र और ब्रह्माका पद मिल जाय तो भी आपको शान्ति मिलेगी नहीं । यह एकदम सच्ची बात है, सबके लिये । साधु हो चाहे गृहस्थ, भाई हो या बहिन । जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी, तबतक शान्ति मिलेगी नहीं, तृप्ति होगी नहीं; क्योंकि अविनाशीकी तृप्ति विनाशी संसारसे कैसे हो जायगी ? यह असम्भव बात है । यदि आवश्यकता और इच्छाको ठीक-ठीक समझकर आवश्यकताकी पूर्ति की जाय तो सब काम ठीक हो जाय । आवश्यकताकी पूर्ति अवश्य होनेवाली है और इच्छा निश्चय ही मिटनेवाली है । जैसे बचपनमें खिलौनोंकी इच्छा थी; परन्तु अब होती है क्या ? इसी प्रकार ठीक वैराग्य होनेपर रुपयोंकी आवश्यकता रहती है क्या ? संग्रह, भोगकी इच्छा रहती है क्या ? तो पुरानी इच्छाएँ मिटती रहती हैं, परन्तु नयी जागृत होती रहती हैं । इच्छा होती है कि मोटर हो जाय । फिर मोटर रखनेको गैरेज होना चाहिये, तेल चाहिये, ट्यूब-टायर, पुर्जे चाहिये आदि । इच्छाएँ बढ़ती ही रहेंगी । ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ।’ इनका अन्त तभी होगा, जब आवश्यकताकी पूर्ति हो जायगी अर्थात् परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी ।

सबसे पहले जितने भाई, बहिन यहाँ हैं; अपनेसे पूछें कि मैं क्या चाहता हूँ । हममेंसे बहुतोंको तो इस बातका ज्ञान ही नहीं है कि हम क्या चाहते हैं ! कोई धन चाहता है, कोई पुत्र चाहता है, कोई मान, आदर चाहता है, परन्तु जिसे कभी चाहते हैं, कभी नहीं चाहते, वह हमारी असली चाहना नहीं । हमारी चाहना तो सदा रहेगी, चाहे रात हो चाहे दिन हो, सुख हो अथवा दुःख । सम्पत्ति मिले चाहे विपत्ति मिले । वही हमारी चाह या आवश्यकता है । कामना हमारी चाह नहीं । वह तो शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, प्राणकी चाह है, हमारी नहीं है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‘जीवनका सत्य’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, वि.सं.२०७२, सोमवार
श्रीराधाष्टमी, महर्षि दधीचि-जयन्ती
आवश्यकता और इच्छा



(गत ब्लॉगसे आगेका)
मूलमें बात यह है कि जैसे शरीरमें भोजनकी आवश्यकता है, ऐसे ही स्वयंको परमात्माकी आवश्यकता है । संसारकी तो मात्र इच्छा है, आवश्यकता है ही नहीं । स्वयंको न तो धनकी आवश्यकता है, न अन्नकी आवश्यकता है, न शरीरकी आवश्यकता है, न कुटुम्बकी आवश्यकता है, न संग्रहकी आवश्यकता है, न भोगोंकी आवश्यकता है । इस स्वयंको परमात्माकी आवश्यकता है । क्योंकि यह परमात्माका अंश है‒

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
                                       (गीता १५ । ७)

इसे परमात्माके अतिरिक्त और कोई आवश्यकता नहीं । परन्तु इच्छाओंमें इतना फँसा हुआ है कि इच्छा कभी पूरी होती नहीं, और आवश्यकता जो पूरी होनेवाली है, उसे जागृत करता नहीं, अतः हरदम दुःख पाता है । वास्तवमें आवश्यकता एक होती है । भगवान्ने कहा है‘व्यवसायात्मिका बुद्धिरेका ।’ (गीता २ । ४१) । अर्थात् निश्चयात्मिका बुद्धि एक होती है ।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥
                                                   (गीता २ । ४१)

परन्तु अव्यवसायियोकी बुद्धियाँ अनन्त होती हैं अर्थात् उनकी अनन्त इच्छाएँ होती हैं । आवश्यकता क्या है ? संसारकी इच्छाका त्याग करना और परमात्माकी प्राप्ति करना । परंतु इच्छाएँ अनेक होती हैं । जैसे हलुवा मिल जाय, पूड़ी मिल जाय, चटनी मिल जाय, धन हो जाय, परिवार हो जाय, मान-सत्कार मिल जाय आदि । परन्तु आवश्यकता होगी कि पेट भरना है; फिर साग-पत्ती ही क्यों न हो ! ऐसे ही मनुष्यको आवश्यकता परमात्मतत्त्वकी है, उसके बिना आवश्यकता मिटेगी नहीं । परन्तु इच्छा कभी मिटेगी नहीं । ज्यों-ज्यों इच्छाकी पूर्ति करेगा त्यों-त्यों इच्छाएँ बढ़ेगी । इनका कभी अन्त नहीं होगा । इनकी पूर्ति असम्भव है ।


इच्छाओंका त्याग और आवश्यकताकी पूर्ति करनी होगी । चाहे तो आवश्यकताकी पूर्ति कर दो तो इच्छाएँ मिट जायँगी । चाहे इच्छाओंको मिटा दो तो आवश्यकताकी पूर्ति हो जायगी । दोनोमेंसे एक कर लो तो दोनों पूरी हो जायँगी । संसारकी इच्छाओंका त्याग कर दें तो परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी । सर्वव्यापक परिपूर्ण परमात्मा कैसे दूर हो सकते हैं ? सर्वसमर्थ परमात्मामें हमसे दूर होनेकी सामर्थ्य नहीं है । केवल संसारकी इच्छा होनेके कारण उस सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो रही है । यदि इच्छाएँ सर्वथा मिट जायँ तो उसकी प्राप्ति तत्काल हो जाय ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‘जीवनका सत्य’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल सप्तमी, वि.सं.२०७२, रविवार
महारविवार-व्रत
आवश्यकता और इच्छा


बिलकुल अनजानपनेका नाम अज्ञान नहीं है और पूरी जानकारीका नाम भी ज्ञान नहीं है । कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते‒उसका नाम अज्ञान है अर्थात् अधूरे ज्ञानको अज्ञान कहते हैं । सर्वथा ज्ञानके अभावको अज्ञान नहीं कहते । जैसे पत्थरको कोई अज्ञानी नहीं कहता; क्योंकि ज्ञान है ही नहीं उसमें । दूसरा अज्ञानी वह है‒जो जानता है, पर मानता नहीं है । यदि वह जैसे जानता है, वैसे ही मान ले और वैसे ही कर ले तो उसका अज्ञान बिलकुल दूर हो जायगा । इसमें न किसीके पास जानेकी आवश्यकता है, न सीखनेकी ।

मनुष्य क्या जानता है । यह जानता है कि शरीर, कुटुम्ब, संसार सब-के-सब पहले नहीं थे और फिर नहीं रहेंगे । परंतु मैं पहले भी था और शरीरके बाद भी रहूँगा । परन्तु इस बातको हम मानते कहाँ हैं ? हम शरीर और संसारको रखना चाहते हैं । हम चाहते हैं कि शरीर नीरोग रहे, धन-सम्पत्ति आ जाय, आदर-सत्कार हो । परन्तु कौन नहीं जानता कि जिस शरीर और नामको लेकर हम यह सब चाहते हैं, वह शरीर और नाम पहले भी था, पर वह आज याद ही नहीं है, ऐसे ही यह शरीर और नाम भी याद नहीं रहेगा जिसके लिये रात-दिन परिश्रम कर रहे हैं । इसका नाम अज्ञान है । जो कुछ करो; दूसरोंके लिये करो, संसारके लिये करो । संसारसे मेरेको कुछ नहीं मिलेगा‒यह पक्का सिद्धान्त मान लें । क्योंकि मैं नित्य हूँ और संसार अनित्य है । संसारसे मेरेको कुछ मिल सकता है‒यह सोचना ही अज्ञान है । फिर भी संसारको प्राप्त करनेके लिये उद्योग करते हैं रात-दिन । परन्तु जो अपना है और मिल सकता है, उसके लिये उद्योग नहीं करते । यह एकदम पक्की, सच्ची, सिद्धान्तकी बात है ।

अब एक बात और बतावें । आप ध्यान देकर सुनें, समझें और उसमें शंका हो तो पूछें । मनुष्यके भीतर इच्छा होती है । उस इच्छाके दो भाग होते हैं । एक होती है‒कामना (इच्छा) और एक होती है‒आवश्यकता । उदाहरणके लिये, जैसे भूख लगी तो भूखमें खाद्य पदार्थ (भोजन) की आवश्यकता है, जिससे प्राण रह सकते हैं । ऐसे ही प्यासमें जलकी आवश्यकता है । परंतु कामना या इच्छा क्या है ? इच्छा है कि भोजन बढ़िया हो, मीठा हो, स्वादिष्ट हो, जल ठण्डा हो, मीठा हो । भूख बातोंसे नहीं मिटेगी । वह तो खानेसे मिटेगी; परन्तु इच्छा विचारसे मिट जायगी । जैसे अमुक वस्तु स्वादिष्ट है, पर कुपथ्य है । अतः नहीं खायेंगे; क्योंकि इससे रोग बढ़ सकता है । यह तो एक दृष्टान्त हुआ ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‘जीवनका सत्य’ पुस्तकसे

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आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल षष्ठी, वि.सं.२०७२, शनिवार
लोलार्क षष्ठी-व्रत
प्रवचन‒११


(गत ब्लॉगसे आगेका)
वास्तवमें तो हम मुक्त ही है, पर द्वन्द्वोंको अपना मान करके फँस जाते है‒

इच्छाद्वेषसमुत्थेन   द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥
                                        (गीता ७ । २७)

इच्छा (राग) और द्वेष, हर्ष और शोक‒इन द्वन्द्वमोहसे मोहित होकर इनसे परे उस परमात्माको नहीं जानते । ‘सर्गे यान्ति’ का मतलब‒आरम्भमें ही यह जीव मोहको प्राप्त हो जाता है और बार-बार जन्मता-मरता रहता है । बदलनेवालेमें स्थित न होकर; अपने स्वरूपमें जो कि सम्पूर्णको जानता है, स्थित हो जायँ और जाननेमें आनेवाली तथा बदलनेवाली वस्तुके साथ न बदलें अर्थात् उसके साथ अपनी एकता न मानें तो हमारी स्थिति स्वतः स्वरूपमें है । स्वतः स्वरूपमें स्थितिका नाम है‒जीवन्मुक्ति । पर स्वतः रहनेवालेके साथ न रहकर बदलनेवालेके साथ मिल जाते हैं, इसका नाम है‒बन्धन । बन्धनको हम जब चाहें तब छोड़ दें और जब चाहें तब पकड़ लें । इसमें हम पराधीन नहीं हैं, स्वाधीन हैं । बन्धन पकड़कर बन्धनमें कभी स्थित रह नहीं सकते और स्वरूपसे विमुख होकर स्वरूपसे अलग कभी रह नहीं सकते; क्योंकि बन्धन तो मिटते रहते हैं, हम नये-नये पकड़ते रहते हैं और हमारा जो स्वरूप है, वह ज्यों-का-त्यों ही रहता है, कभी बदलता नहीं । स्वरूपमें हमारी स्थिति स्वतःसिद्ध है । स्वतःसिद्ध स्थितिका आदर न करके परतः स्थितिका, जो बदलती रहती है, आदर करते हैं‒महत्त्व देते है; इसीसे जन्म-मरणमें भटकते हैं और दुःख पाते हैं ।

जब हम बदलनेवालेके साथ न रहकर, जो सम्पूर्ण बदलनेवालेको जानता है, उसमें स्थित हो जायँ तो हम अभी मुक्त हैं । मुक्तिके लिये भविष्य नहीं होगा । अमुक चीज नहीं है, अमुक अवस्था नहीं है, अमुक परिस्थिति नहीं है तो वह समय पाकर होगी । परन्तु यह समय पाकर नहीं होगा । यह समयसे अतीत है और सब समयमें है, किसी देशमें नहीं है और सम्पूर्ण देशोंमें है, किसी वस्तुमें नहीं है और सम्पूर्ण वस्तुओंमें है । देश काल, वस्तु, व्यक्तिसे सर्वथा अतीत होते हुए भी सबमें परिपूर्ण है । उसमें स्थित होना स्वरूपमें स्थित होना है ।

ज्ञानीकी भी वृत्तियाँ बदलती हैं‒‘प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।’ (गीता १४ । २२) अर्थात् तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषमें भी प्रकाश, प्रवृत्ति और मोहकी वृत्तियाँ होती हैं । बदलना इनका स्वभाव है और न बदलना हमारा स्वभाव है । उस स्वरूपमें हम स्वतः-स्वाभाविक स्थित है । केवल प्रकृतिमें स्थित नहीं होना है ।

अब कोई प्रश्र करे कि यह बात समझमें तो आती है पर टिकती नहीं । तो उसका उत्तर यह है कि वास्तवमें यह बात मिटती ही नहीं, प्रत्युत निरन्तर रहती है; क्योंकि यह बात टिकती नहीं‒इसे तो हम जानते ही है । ‘टिकती नहीं’‒यह प्रकृति है और ‘जानते है’‒यह स्वरूप है । प्रकृतिके साथ मिलें नहीं, इतनी ही बात है । वह तो मिटती ही है और स्वरूप टिकता ही है ।

यह टिकती नहीं‒इसे जाननेवाला भी मिटता है क्या ? यदि मिटता है तो जानता कौन है ? मिटनेको जाननेवाला न रहे तो मिटनेको जानेगा कौन ? प्रकृति परिवर्तनशील है । वह तो बदलेगी ही । जाग्रत् होगा, स्वप्न होगा, सुषुप्ति होगी, ठीक होगा, बेठीक होगा, अनुकूल होगा, प्रतिकूल होगा‒यह तो सदा ही होगा । पर इसे जाननेवालेमें क्या फर्क पड़ा ? हम बदलनेवालेमें स्थित न हों; बदलनेवालेकी परवाह न करें । हम अपने स्वरूपमें ही स्थित रहें । अपने स्वरूपकी परवाह करनी है, उससे च्युत नहीं होना है । यह निश्चय हम पक्का रखें । फिर इसमें गलती नहीं होगी । इसपर जितना टिक जायँ, उतना ही लाभ होगा ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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