।। श्रीहरिः ।।

गीतामें

मूर्तिपूजा-४

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्न—दुष्टलोग मूर्तियोंको तोडते हैं तो भगवान् उनको अपना प्रभाव, चमत्कार क्यों नहीं दिखाते ?

उत्तर—जिनकी मूर्तिमें सद्भावना नहीं है, जिनका मूर्तिमें भगवत्पूजन करनेवालोंके साथ द्वेष है और द्वेषभावसे ही जो मूर्तिको तोड़ते हैं, उनके सामने भगवान् का प्रभाव, महत्त्व प्रकट होगा ही क्यों ? कारण कि भगवान् का महत्त्व तो श्रद्धाभावसे ही प्रकट होता है ।

मूर्तिपूजा करनेवालोंमें ‘मूर्तिमें भगवान् हैं’—इस भावकी कमी होनेके कारण ही दुष्टलोगोंके द्वारा मूर्ति तोड़े जानेपर भगवान् अपना प्रभाव प्रकट नहीं करते । परन्तु जिन भक्तोंका ‘मूर्तिमें भगवान् हैं’—ऐसा दृढ श्रद्धा-विश्वास है, वहाँ भगवान् अपना प्रभाव प्रकट कर देते हैं । जैसे, गुजरातमें सूरतके पास एक शिवजीका मन्दिर है । उसमें स्थित शिवलिंगमें छेद-ही-छेद हैं । इसका कारण यह था कि जब मुसलमान उस शिवलिंगको तोडनेके लिये आये, तब उस शिवलिंगसे असंख्य बड़े-बड़े भौरे प्रकट हो गये और उन्होंने मुसलमानोंको भगा दिया ।

जो परीक्षामें पास होना चाहता हैं, वे ही परीक्षकको आदर देते हैं, परीक्षकके अधीन होते हैं; क्योंकि परीक्षक जिसको पास कर देता है, वह पास हो जाता है और जिसको फेल कर देते है, वह फेल हो जाता है । परन्तु भगवान् को किसीकी परीक्षामें पास होनेकी जरूरत ही नहीं है; क्योंकि परीक्षामें पास होनेसे भगवान् का महत्त्व बढ़ नहीं जाता और परीक्षामें फेल होनेसे भगवान् का महत्त्व घट नहीं जाता । जैसे, रावण भगवान् रामकी परीक्षा लेनेके लिये मारीचको मायामय सुवर्णमृग बनाकर भेजता है तो भगवान् सुवर्णमृगके पीछे दौड़ते हैं अर्थात् रावणकी परीक्षामें फेल हो जाते हैं; क्योंकि भगवान् को पास होकर दुष्ट रावणसे कौन-सा सर्टिफिकेट लेना था ! ऐसे ही दुष्टलोग भगवान् की परीक्षा लेनेके लिये मन्दिरोंको तोड़ते हैं तो भगवान् उनकी परीक्षामें फेल हो जाते हैं, उनके सामने अपना प्रभाव प्रकट नहीं करते; क्योंकि वे दुष्टभावसे ही भगवान् के सामने आते हैं ।

एक वस्तुगुण होता है और एक भावगुण होता है । ये दोनों गुण अलग-अलग हैं । जैसे, पत्नी, माता और बहन—इन तीनोंका शरीर एक ही है अर्थात् जैसा पत्नीका शरीर है, वैसा ही माता और बहनका शरीर है; अतः तीनोंमें ‘वस्तुगुण’ एक ही हुआ । परन्तु पत्नीसे मिलनेपर और भाव रहता है, मातासे मिलनेपर और भाव रहता है तथा बहनसे मिलनेपर और भाव रहता है; अतः वस्तु एक होनेपर भी ‘भावगुण’ अलग-अलग हुआ । संसारमें भिन्न-भिन्न स्वभावके व्यक्ति, वस्तु आदि हैं; अतः उनमें वस्तुगुण तो अलग-अलग है, पर सबमें भगवान् परिपूर्ण हैं—यह भावगुण एक ही है । ऐसे ही जिसकी मूर्तिपर श्रद्धा है, उसमें ‘मूर्ति पत्थर, पीतल, चाँदी आदिकी है’—ऐसा वस्तुगुण रहता है । तात्पर्य है कि अगर मूर्तिमें पूजकका भाव भगवान् का है तो उसके लिये वह साक्षात् भगवान् ही है । अगर पूजकका भाव पत्थर, पीतल, चाँदी आदिकी मूर्तिका है तो उसके लिये वह साक्षात् पत्थर आदिकी मूर्ति ही है; क्योंकि भावमें ही भगवान् हैं—

न काष्ठे विद्यते देवो न शिलायां न मृत्सु चा ।
भावे ही विद्यते देवस्तस्माद् भावं समाचरेत् ॥
(गरुड़पुराण, उत्तर. ३/१०)

‘देवता न तो काष्ठमें रहते हैं, न पत्थरमें और न मिट्टीमें रहते हैं । भावमें ही देवताका निवास है, इसलिये भावको ही मुख्य मानना चाहिये ।’

एक वैरागी बाबा थे । उनके पास सोनेकी दो मूर्तियाँ थीं—एक गणेशजीकी और एक चूहेकी । दोनों मूर्तियाँ तौलमें बराबर थीं । बाबाको रामेश्वर जाना था । अतः उन्होंने सुनारके पास जाकर कहा कि भैया ! इन मूर्तियोंके बदले कितने रुपये दोगे ? सुनारने दोनों मूर्तियोंको तौलकर दोनोंके पाँच-पाँच सौ रुपये बताये अर्थात् दोनोंकी बराबर कीमत बतायी । बाबा बोले—अरे ! तू देखता नहीं, एक मालिक है और एक उनकी सवारी है । जितना मूल्य मालिक-(गणेशजी-) का, उतना ही मूल्य सवारी-(चूहे-) का—यह कैसे हो सकता है ? सुनार बोला—बाबा ! मैं तो गणेशजी और चूहेका मूल्य नहीं लगता, मैं तो सोनेका मूल्य लगता हूँ । तात्पर्य है कि बाबाकी दृष्टि गणेशजी और चूहेपर है और सुनारकी दृष्टि सोनपर है अर्थात् बाबाको भावगुण दीखता है और सुनारको वस्तुगुण दीखता है । ऐसे ही जो मूर्तियोंको तोडते हैं, उनको वस्तुगुण दीखता है अर्थात् उनको पत्थर, पीतल आदि ही दीखता है । अतः भगवान् उनकी भावनाके अनुसार पत्थर आदिके रूपसे ही बने रहते हैं ।

वास्तवमें देखा जाय तो स्थावर-जंगम आदि सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है । जिनमें भावगुण अर्थात् भगवान् की भावना है, उनको सब कुछ भगवत्स्वरूप ही दीखता है; परन्तु जिनमें वस्तुगुण अर्थात् संसारकी भावना है, उनको स्थावर-जंगम आदि सब कुछ अलग-अलग ही दीखता है । यही बात मूर्तिके विषयमें भी समझ लेनी चाहिये ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)


—‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

गीतामें मूर्तिपूजा-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
एक साधु थे । उनकी खुराक बहुत थी । एक बार उनके शरीरमें रोग हो गया । किसीने उनसे कहा कि महाराज ! आप गायका दूध पिया करें, पर दूध वही पीयें, जो बछड़ेके पीनेपर बच जाय । उन्होंने ऐसा ही करना शुरू कर दिया । जब बछड़ा पेट भरकर अपनी माँका दूध पी लेता, तब वे गायका दूध निकालते । गायका पाव-डेढ़ पाव दूध निकलता, पर उतना ही दूध पीनेसे उनकी तृप्ति हो जाती । कुछ ही दिनोंमें उनका रोग मिट गया और वे स्वस्थ हो गये । जब न्याययुक्त वस्तुमें भी इतनी शक्ति है कि थोड़ी मात्रामें लेनेपर भी तृप्ति हो जाय, तो फिर जो वस्तु भावपूर्वक दी जाय, उसका तो कहना ही क्या है !

यह तो सबका ही अनुभव है कि कोई भावसे, प्रेमसे भोजन कराता है तो उस भोजनमें विचित्र स्वाद होता है और उस भोजनसे वृत्तियाँ भी बहुत अच्छी रहती है । केवल मनुष्यपर ही नहीं, पशुओंपर भी भावका असर पडता है । जिस बछड़ेकी माँ मर जाती है, उसको लोग दूसरी गायका दूध पिलाते हैं । इससे वह बछड़ा जी तो जाता है, पर पुष्ट नहीं होता । वही बछड़ा अगर अपनी माँका दूध पीता तो माँ उसको प्यारसे चाटती, दूध पिलाती, जिससे वह थोड़े ही दूधसे पुष्ट हो जाता । जब मनुष्य और पशुओंपर भी भावका असर पडता है, तो फिर अन्तर्यामी भगवान् पर भावका असर पड़ जाय, इसका तो कहना ही क्या है ! विदुरानीके भावके कारण ही भगवान् ने उसके हाथसे केलेके छिलके खाये । गोपियोंके भावके कारण ही भगवान् ने उनके हाथसे छीनकर दही, मक्खन खाया । भगवान् ब्रह्माजीसे कहते हैं—

नैवेद्यं पुरतो चक्षुषा गृह्यते मया ।
रसं च दासजिह्वायामश्नामि कमालोद्भव ॥

‘हे कमलोद्भव ! मेरे सामने रखे हुए भोगोंको मैं नेत्रोंसे ग्रहण करता हूँ; परन्तु उस भोगका रस मैं भक्तकी जिह्वाके द्वारा ही लेता हूँ ।’

ऐसी बात सन्तोंसे सुनी है कि भावसे लगे हुए भोगको भगवान् कभी देख लेते हैं, कभी स्पर्श कर लेते हैं । और कभी कुछ ग्रहण भी कर लेते हैं ।

जैसे घुटनोंके बलपर चलनेवाला छोटा बालक कोई वस्तु उठाकर अपने पिताजीको देता है तो उसके पिताजी बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और हाथ ऊँचा करके कहते हैं कि बेटा ! तू इतना बड़ा हो जा अर्थात् मेरेसे भी बड़ा हो जा । क्या वह वस्तु अलभ्य थी ? क्या बालकके देनेसे पिताजीको कोई विशेष चीज मिल गयी ? नहीं । केवल बालकके देनेके भावसे ही पिताजी राजी हो गये । ऐसे ही भगवान् को किसी वस्तुकी कमी नहीं है और उनमें किसी वस्तुकी इच्छा भी नहीं है, फिर भी भक्तके देनेके भावसे वे प्रसन्न हो जाते हैं । परन्तु जो केवल लोगोंको दिखानेके लिये, लोगोंको ठगनेके लिये मन्दिरोंको सजाते हैं, ठाकुरजी-(भगवान् के विग्रह-) का शृंगार करते हैं, उनको बढ़िया-बढ़िया पदार्थोंका भोग लगाते हैं तो उसको भगवान् ग्रहण नहीं करते; क्योंकि वह भगवान् का पूजन नहीं है, प्रत्युत रुपयोंका, व्यक्तिगत स्वार्थका ही पूजन है ।

जो लोग किसी भी तरहसे ठाकुरजीको भोग लगानेवालेको, उनकी पूजा करनेवालेको पाखण्डी कहते हैं और खुद अभिमान करते हैं कि हम तो उनसे अच्छे हैं; क्योंकि हम पाखण्ड नहीं करते, ऐसे लोगोंका कल्याण नहीं होता । जो किसी भी तरहसे उत्तम कर्म करनेमें लगे हैं, उनका उतना अंश तो अच्छा है ही । परन्तु जो अभिमानपूर्वक अच्छे आचरणोंका त्याग करते हैं, उसका परिणाम तो बुरा ही होगा ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

गीतामें

मूर्तिपूजा-२


(गत् ब्लॉगसे आगेका)
भगवत्पूजनके सिवाय हाड़-मांसकी पूजा करना अर्थात् अपने शरीरको सुन्दर-सुन्दर गहनों-कपड़ोंसे सजाना, मकानको बढ़िया बनवाना तथा उसे सुन्दर-सुन्दर सामग्रीसे सजाना, शृंगार करना आदि मूर्तिपूजा ही है, जो कि पतनमें ले जानेवाली है ।


ज्ञातव्य

भगवान् सब जगह परिपूर्ण है—ऐसा प्रायः सभी आस्तिक मानते हैं; परन्तु वास्तवमें ऐसा मानना उन्हींका है, जिन्होंने मूर्ति, वेद, सूर्य, पीपल, तुलसी, गाय आदिमें भगवान् को मानकर उनका पूजन शुरू कर दिया है । कारण कि जो मूर्ति, वेद, सूर्य आदिमें भगवान् को मानते हैं, वे स्वतः सब जगह, सब प्राणियोंमें भगवान् को मानने लग जायँगे । जो केवल मूर्ति आदिमें ही भगवान् को मानते हैं, उनको ‘प्राकृत (आरम्भिक) भक्त’ कहा गया है * क्योंकि उन्होंने एक जगह भगवान् का पूजन शुरू कर दिया; अतः वे भगवान् के सम्मुख हो गये । परन्तु जो केवल ‘भगवान् सब जगह हैं’—ऐसा कहते हैं, पर उनका कहीं भी आदरभाव, पूज्यभाव, श्रेष्ठ भाव नहीं है, उनको भक्त नहीं कहा गया है; क्योंकि वे ‘भगवान् सब जगह हैं’—ऐसा केवल कहते हैं, मानते नहीं; अतः वे भगवान् के सम्मुख नहीं हुए ।

मूर्तिमें भगवान् का पूजन श्रद्धाका विषय है, तर्कका विषय नहीं । जिनमें श्रद्धा है, उनके सामने भगवान् का महत्त्व प्रकट हो जाते है । उनके द्वारा की गयी पूजाको भगवान् ग्रहण करते हैं । उनके हाथसे भगवान् प्रसाद ग्रहण करते हैं । जैसे करमाबाईसे भगवान् ने खिचड़ी खायी, धन्ना भक्तसे भगवान् ने टिक्कड खाये, मीराबाईसे भगवान् ने दूध पिया आदि-आदि । तात्पर्य है कि श्रद्धा-भक्तिसे भगवान् मूर्तिमें प्रकट हो जाते हैं ।

प्रश्न—भक्तलोग भगवान् को भोग लगते हैं तो भगवान् उसको ग्रहण करते हैं—इसका क्या पता ?

उत्तर—भगवान् के दरबारमें वस्तुकी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत भावकी प्रधानता है । भावके कारण ही भगवान् भक्तके द्वारा अर्पित वस्तुओं और क्रियाओंको ग्रहण कर लेते हैं । भक्तका भाव भगवान् को भोजन करनेका होता है तो भगवान् को भूख लग जाती हैं । भक्तके भावके कारण भगवान् जिस वस्तुको ग्रहण करते हैं, वह वस्तु नाशवान नहीं रहती, प्रत्युत दिव्य, चिन्मय हो जाती है । अगर वैसा भाव न हो, भावमें कमी हो, तो भी भगवान् भक्तके द्वारा भोजन अर्पण करनेमात्रसे सन्तुष्ट हो जाते हैं । भगवान् के सन्तुष्ट होनेमें वस्तु और क्रियाकी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत भावकी ही प्रधानता है । सन्तोंने कहा है—

भाव भगतकी राबड़ी, मीठी लागे ‘वीर’ ।
बिना भाव ‘कालू’ कहे, कड़वी लागे खीर ॥

हमें एक सज्जन मिले थे । उनकी एक सन्तपर बड़ी श्रद्धा थी और वे उनकी सेवा किया करते थे । वे कहते थे कि जब महाराजको प्यास लगती तो मेरे मनमें आती कि महाराजको प्यास लगी है; अतः मैं जल ले जाता और वे पी लेते । ऐसे ही जो शुद्ध पतिव्रता है, उसको पतिकी भूख-प्यासका पता लग जाता है तथा पतिकी रुचि भोजनके किस पदार्थमें है—इसका भी पता लग जाता है । भोजन सामने आनेपर पति भी कह देता है कि आज मेरे मनमें इसी भोजनकी रुचि थी । इसी तरह जिसके मनमें भगवान् को भोग लगानेका भाव होता है, उसको भगवान् की रुचिका, भूख-प्यासका पता लग जाता है ।

एक मन्दिरके पुजारी थे । उनके इष्ट भगवान् बालगोपाल थे । वे रोज छोटे-छोटे लड्डू बनाया करते और रातके समय जब बालगोपालको शयन कराते, तब उनके सिरहाने वे लड्डू रख दिया करते; क्योंकि बालकको रातमें भूख लग जाया करती है । एक दिन वे लड्डू रखना भूल गये तो रातमें बालगोपालने पुजारीको स्वप्नमें कहा कि मेरेको भूख लग रही है ! ऐसे ही एक और घटना है । एक साधु थे । वे प्रतिवर्ष दीपावलीके बाद (ठण्डीके दिनोंमें) भगवान् को काजू, बादाम, पिस्ता, अखरोट, आदिका भोग लगाया करते थे । एक वर्ष सुखा मेवा बहुत महँगा हो गया तो उन्होंने मूँगफलीका भोग लगाना शुरू कर दिया । एक दिन रातमें भगवान् ने स्वप्नमें कहा कि क्या तू मूँगफली ही खिलायेगा ? उस दिनके बाद उन्होंने पुनः भगवान् को काजू आदिका भोग लगाना शुरू कर दिया । पहले उनके मनमें कुछ वहम था कि पता नहीं, भगवान् भोगको ग्रहण करते हैं या नहीं ? जब भगवान् ने स्वप्नमें ऐसा कहा, तब उनका वहम मिट गया । तात्पर्य है कि कोई भगवान् को भोग लगता है तो उनको भूख लग जाती है और वे उसको ग्रहण कर लेते हैं ।
टिपण्णी—

अचार्यामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते ।
न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥
(श्रीमद्भागवत ११/२/४७)

(शेष आगेके ब्लॉगमें )

—‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

गीतामें मूर्तिपूजा-१


ये सनातनधर्मस्थाः

श्रद्धाप्रेमसमन्वितः ।

मूर्तिपूजां न कुर्वन्ति

मूर्तौ तू प्रभुपूजनम् ॥

हमारे सनातन वैदिक सिद्धान्तमें भक्त लोग मूर्तिका पूजन नहीं करते, प्रत्युत परमात्माका ही पूजन करते हैं । तात्पर्य है कि जो परमात्मा सब जगह परिपूर्ण है, उसका विशेष ख्याल करनके लिये मूर्ति बनाकर उस मूर्तिमें उस परमात्माका पूजन करते हैं, जिससे सुगमतापूर्वक परमात्माका ध्यान-चिन्तन होता रहे ।

अगर मूर्तिकी ही पूजा होती है तो पूजकके भीतर पत्थरकी मूर्तिका ही भाव होना चाहिये कि तुम अमुक पर्वतसे निकले हो, अमुक व्यक्तिने तुमको बनाया है, अमुक व्यक्तिने तुमको यहाँ लाकर रखा है; अतः हे पत्थरदेव ! तुम मेरा कल्याण करो ।’ परंतु ऐसा कोई कहता ही नहीं, तो फिर मूर्तिपूजा कहाँ हुई ? अतः भक्तलोग मूर्तिकी पूजा नहीं करते; किंतु मूर्तिमें भगवान् की पूजा करते हैं अर्थात् मूर्तिभाव मिटाकर भगवद्भाव करते है । इस प्रकार मूर्तिमें भगवान् का पूजन करनेसे सब जगह भगवद्भाव हो जाता है । भगवत्पूजनसे भगवान् की भक्तिका आरम्भ होता है । भक्तके सिद्ध हो जाने पर भी भगवत्पूजन होता ही रहता है ।


मूर्तिमें अपनी पूजाके विषयमें भगवान् ने गीतामें कहा है कि ‘’भक्तलोग भक्तिपूर्वक मेरेको नमस्कार करते हुए मेरी उपनासना करते हैं’ (९/१४); जो भक्त्त श्रद्धा-प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल, जल आदि मेरे अर्पण करता है, उसके दिये हुए उपहारको मैं खा लेता हूँ’ (९/२६); देवताओं (विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश और सूर्य—ये ईश्वरकोटिके पञ्चदेवता), ब्राह्मणों, आचार्य, माता-पिता आदि बड़े-बूढ़ों और ज्ञानी जीवन्मुक्त महात्माओंका पूजन करना शारीरिक तप है (१७/१४) अगर सामने मूर्ति न हो तो किसको नमस्कार किया जायगा ? किसको पत्र, पुष्प, फल, जल आदि चढ़ाये जायँगे और किसका पूजन किया जायेगा ? इससे सिद्ध होता है कि गीतामें मूर्तिपूजाकी बात भी आयी है ।

इसी तरह गाय, तुलसी, पीपल, ब्राह्मण, तत्वज्ञ जीवन्मुक्त, गिरिराज गोवर्धन, गंगा, यमुना आदिका पूजन भी भगवत्पूजन है । इनका पूजन करनेसे ‘सब जगह परमात्मा है’ यह बात सुगमतासे अनुभवमें आ जाती है; अतः सब जगह परमात्माका अनुभव करनेमें गाय आदिका पूजन बहुत सहायक है । कारण कि पूजा करानेवालेने ‘सब जगह परमात्मा है’—ऐसा मानना तो शुरू कर दिया है । परन्तु जो किसीका भी पूजन नहीं कराता, केवल बातें ही बनाता है, उसको ‘सब जगह परमात्मा है’—इसका अनुभव नहीं होगा । तात्पर्य है कि मूर्तिमें भगवान् का पूजन करना कल्याणका, श्रेयका साधन है ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे

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अपने अनुभवका

आदर-३


(गत् ब्लॉगसे आगेका)
श्रोता—शरीर तो प्रत्यक्ष दीखता है; इसको कैसे नहीं मानें ?

स्वामीजी—दीखता है तो दीखता रहे, इसको मानो मत । दर्पणमें अपना मुख दीखता है तो उस मुखको आप दर्पणमें मानते हो क्या ? नहीं मानते । दर्पणमें दिखनेवाले मुखको आप पकड़ सकते हो क्या ? नहीं पकड़ सकते । अतः जो दीखता है, उसको आप मत मानो । मैं शरीर हूँ—यह दर्पणमें दिखनेवाले मुखकी तरह दीखता है, वास्तवमें है नहीं । अगर आप और शरीर एक होते तो शरीर आपसे छूट नहीं सकता और आप शरीरको छोड़ नहीं सकते । परन्तु मरनेपर शरीर छूट जाता है और आप शरीरको छोड़ देते हो; आप और शरीर एक नहीं हुए । जैसे, मैं मकानमें बैठा हूँ तो मेरे बिना भी यह मकान रहता है और इस मकानके बिना भी मैं रहता हूँ; अतः मैं मकान नहीं हूँ । हम मरे हुए मनुष्योंको, पशुओंको देखते हैं कि उनके शरीर तो यहीं पड़े हैं, पर उनमें रहनेवाला जीवात्मा चला गया है । वे दोनों अभी अलग हुए हों, ऐसी बात नहीं है । वे तो पहलेसे ही अलग थे । अगर जीवात्मा और शरीर एक एक होते तो जीवात्माके साथ शरीर भी चला जाता अथवा शरीरके साथ जीवात्मा भी यहीं रहता । परन्तु न तो जीवात्माके साथ शरीर रहता है और न शरीरके साथ जीवात्मा रहता है । अतः शरीर और जीवात्मा दो हैं—इसमें कोई सन्देह नहीं । इन दोनोंको अलग-अलग जानना ही ज्ञान है, जिसका वर्णन भगवान् ने गीताके आरम्भमें किया है (२/११-३०) । अपने उपदेशके आरम्भमें ही भगवान् ने बताया कि शरीर और शरीरी, देह और देही—ये दोनों अलग-अलग हैं । शरीर सदा बदलनेवाला है, पर शरीरी कभी बदलनेवाला, नष्ट होनेवाला नहीं है । इस प्रकार जान लेनेपर शोक हो ही नहीं सकता; क्योंकि नाश होनेवालेका नाश होगा ही, इसमें शोककी क्या बात ? और अविनाशी सदा अविनाशी ही रहेगा, शोक किस बातका ?

जैसे आप अपनेको शरीरमें मानते हैं, ऐसे ही परमात्मतत्त्व सम्पूर्ण संसारमें है । सम्पूर्ण संसारमें होते हुए भी परमात्माका संसारसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है । सब-का-सब संसार उथल-पुथल हो जाय, तो भी आपका कुछ नहीं बिगडता । ऐसे ही आपका शरीर उथल-पुथल हो जाय, तो भी आपका कुछ नहीं बिगडता । आप जैसे हो, वैसे ही रहते हो । आपने गुणोंका संग माना है, शरीरके साथ अपना सम्बन्ध माना है, इसलिये जन्म-मरण होते हैं—‘कारणं गुणसंगोस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३/२१) । गुणोंका संग छोड़नेपर जन्म-मरण है ही नहीं । गुणोंका संग आपने माना है; अतः उसको न माननेपर वह सम्बन्ध मिट जायगा ।

यह एक सीधी, सच्ची बात है कि आप नित्य-निरन्तर रहते हैं और शरीर एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता, नित्य-निरन्तर बदलता है । यह बात सुननेपर अच्छी लगती है, ठीक (सही) लगती है, फिर भी यह बात रहती नहीं—ऐसा आप मत मानो । यह बात कभी जा नहीं सकती । अनन्त युगोंसे यह बात वही रही, तो अब कैसे चली जायगी ? पहले इस बातकी तरफ लक्ष्य नहीं था, अब लक्ष्य हो गया—इतना फर्क पड़ गया बस । यह बात न तो पहले गयी थी, न अब जायगी । यह तो सदा ऐसे ही रहेगी । याद न रहे तो भी यह ऐसे ही रहेगी । इसका अनुभव न हो तो भी यह बात ऐसे ही रहेगी । जैसे, अभी यह खम्भा दीखता है । बाहर चले जाओ तो यह खम्भा नहीं दीखेगा, तो यह खम्भा मिट गया क्या ? जो बात सही है, वह तो ज्यों-कि-त्यों ही रहेगी ।

श्रोता—फिर बाधा क्या लग रही है ?

स्वामीजी—दूसरोंसे सुख लेते हैं—यही खास बाधा है । अब दूसरोंको सुख देना शुरू कर दो । इतने दिन तो सुख लिया है, अब सुख देना शुरू कर दो, बस । निहाल हो जाओगे !

रूपया-पैसा मेरेको मिल जाय, आराम मेरेको मिल जाय, सुख मेरेको मिल जाय, मान मेरा हो जाय, बड़ाई मेरी हो जाय—यही महान् बाधा है और इससे मिलेगा कुछ भी नहीं । रूपया-पैसा, मान-बड़ाई आदि मिल जायँ तो भी टिकेंगे नहीं और टिक भी जायँ तो आपका शरीर नहीं टिकेगा । शुद्ध हानिके सिवाय केश-जितना भी लाभ नहीं होगा । इतने नुकसानकी बातको भी नहीं छोड़ोगे तो क्या छोड़ोगे ?

संसारसे सुख लेनेकी जो कामना है, यही बाधा है । धन, मान, भोग, जमीन, मकान आदिकी कई तरहकी कामनाएँ हैं, पर मूलमें कामना यही है कि मेरे मनकी पूरी हो जाय, मैं जैसा चाहूँ वैसा हो जाय । अगर इसकी जगह यह भाव हो जाय कि मेरे मनकी न होकर भगवान् के मनकी हो जाय अथवा संसारके मनकी हो जाय तो निहाल हो जाओगे, इसमें सन्देह नहीं । भगवान् के मनकी बात पूरी हो जाय—यह भक्तियोग हो गया । संसारके मनकी बात पूरी हो जाय—यह कर्मयोग हो गया । मेरे मनकी बात है ही नहीं, मन मेरा नहीं, यह तो प्रकृतिका है—यह ज्ञानयोग हो गया ।

नारायण ! नारायण ! नारायण !


—-‘कल्याणकारी प्रवचन’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

अपने अनुभवका

आदर-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
शरीरके साथ हमारी एकता नहीं है, पर उसके साथ एकता मान ली और परमात्माके साथ हमारी एकता है, पर उसके साथ एकता नहीं मानी—यह केवल मान्यताका फर्क है और कुछ फर्क नहीं । हमने मान्यता गलत कर रखी है । शरीर बदलता है, पर आप नहीं बदलते । संसार बदलता है, पर परमात्मा नहीं बदलते । अतः न बदलनेवाले हम परमात्माके साथ एक है और बदलनेवाला शरीर संसारके साथ एक है—यह विवेक मनुष्यमात्रमें स्वतःसिद्ध है । यह कभी मिट नहीं सकता ।

संसार और परमात्मा, हमारे शरीरका और हमारे स्वरूपका जो दो-पना (अलगाव) है, यह कभी मिटेगा नहीं । यह नित्य निरन्तर रहनेवाला है । परन्तु मनुष्य इस बातका आदर नहीं करता, इसको महत्त्व नहीं देता । ‘मैं शरीर हूँ’—इस बातको पकड़ रखा है । परन्तु शरीरके साथ एकताको अभीतक कोई पकडकर रख सका नहीं और रख सकता नहीं और रख सकेगा नहीं । अतः शरीर और संसार एक हैं तथा मैं और परमात्मा एक हैं । मैं और परमात्मा एक हैं—इस विषयमें मतभेद है । द्वैत-मतवाले परमात्माके साथ जातीसे एकता मानते हैं और अद्वैत-मतवाले स्वरूपसे एकता मानते हैं । परन्तु मैं और शरीर एक नहीं हैं—इस विषयमें कोई मतभेद नहीं है । श्रीशंकराचार्य, श्रीविष्णुस्वामी, श्रीचैतन्य महाप्रभु आदि जितने महापुरुष हुए हैं, उन्होंने द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि नामोंसे अपने-अपने दर्शानोंमें परमात्माके साथ जीवका घनिष्ठ सम्बन्ध माना है । परन्तु शरीरके साथ अपना सम्बन्ध किसीने भी नहीं माना है । शरीर-संसारके साथ हमारी एकता नहीं है—इस विषयमें सभी आचार्य, दार्शनिक, विद्वान एकमत हैं । जिस विषयमें सभी एकमत हैं, उस बातको आप मान लो । हम शरीर-संसारके साथ एक नहीं हैं, हम तो परमात्माके साथ एक हैं—यही ज्ञान है । इस ज्ञानको दृढ़तासे पकड़ लें; इसमें बाधा क्या है ?

शरीरके साथ अपना सम्बन्ध माननेके कारण हम शरीरके सुखसे अपनेको सुखी मानते हैं । शरीरका मान होनेसे हम अपना मान मानते हैं । शरीरकी बड़ाई होनेसे हम अपनी बड़ाई मानते हैं । शरीरके निरादारसे हम अपना निरादर मानते हैं ।शरीरके अपमानसे हम अपना अपमान मानते हैं । वास्तवमें शरीरको कोई पीस डाले, तो भी हमारा कुछ नहीं बिगड़ता । एक दिन इस शरीरको लोग जला ही देंगे, पर हमारा बाल भी बाँका नहीं होगा । हमारे स्वरूपका किञ्चिन्मात्र भी हिस्सा नहीं जलेगा, नष्ट नहीं होगा । अतः संसार हमारा निरादर कर दे, अपमान कर दे, निंदा कर दे, दुःख दे दे, शरीरका टुकड़ा-टुकड़ा कर दे तो क्या हो जायगा ? गीताने कहा है—‘यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते’ (गीता ६/२२) अर्थात् परमात्मस्वरूप आत्यन्तिक सुखमें स्थित मनुष्य बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता । किसी कारणसे शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जायँ, तो भी वह अपने स्वरूपसे विचलित नहीं होता, महान आनन्दसे इधर-उधर नहीं होता । हाँ, शरीरको पीड़ा हो सकती है, मूर्छा आ सकती है, पर दुःख नहीं हो सकता । इतना आनन्द सांसारिक वस्तुओंसे कभी नहीं हो सकता । परन्तु आपने मैं और शरीर दो हैं—इस बातका अनादर कर दिया और शरीरके साथ एक होकर उसके दुःखमें दुःख और सुखमें सुख मान लिया; इसको कृपा करके न मानें ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘कल्याणकारी प्रवचन’ पुस्तकसे

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अपने अनुभवका
आदर-१

एक बहुत सीधी-सरल और सबके अनुभवकी बात है । केवल उसका आदर करना है, उसको महत्त्व देना है, उसको कीमती समझना है । जिस तरह आपने रूपया, सोना, चांदी, हिरा, पन्ना आदिको कीमती समझ रखा है, इस तरह इस बातको कीमती समझो, इसको महत्त्व दो तो अभी इसी क्षण उद्धार हो जाय । इसको महत्त्व नहीं देते, इसी कारणसे बन्धन हो रहा है; और कोई कारण नहीं है । रुपये तो किसीके पास हैं और किसीके पास नहीं, पर यह बात सबके पास है । कोई भी इससे रहित नहीं है । परन्तु इस बातको महत्त्व न देनेसे इसका अनुभव नहीं हो रहा है—
लाली लाली सब कहे, सबके पल्ले लाल ।
गाँठ खोल देखे नहीं, ताते फिरे कंगाल ॥

वह गाँठ खुलनेकी बात बताता हूँ । जो सन्त-महात्माओंसे सुनी है, पुस्तकोमें पढ़ी है, वही बात कहता हूँ । एकदम सच्ची बात है । श्रुति, युक्ति और अनुभूति—ये तीन प्रमाण मुख्य माने गये हैं । अभी मैं जो बात कहने जा रहा हूँ, वह श्रुति- (शास्त्र-) सम्मत, युक्तिसंगत और अनुभवसिद्ध है ।

आप अपनेको मानते हैं कि ‘मैं वही हूँ’, जो बचपनमें था अर्थात् बालकपनमें जो था वही आज हूँ और मरनेतक मैं वही रहूँगा ।’ शास्त्र, सन्त, अपनी संस्कृतिके अनुसार आप ऐसा भी मानते हैं कि पहले जन्मोंमें भी मैं था और इसके बाद भी अगर मेरे जन्म होंगे तो मैं रहूँगा । बालकपन भी अभी नहीं है और मृत्युका समय भी अभी नहीं है; पहलेके जन्म भी अभी नहीं हैं और आगेके जन्म भी नहीं हैं ; परन्तु ‘मैं अभी हूँ ।’ तात्पर्य यह हुआ कि मैं नित्य-निरन्तर हूँ और शरीर बदलते हैं । शरीरोंके बदलनेपर भी मैं किञ्चितमात्र भी नहीं बदलता । शरीर तो प्रतिक्षण बदलते रहते हैं । एक क्षण भी ऐसा नहीं, जिसमें ये न बदलते हों । परन्तु इनमें रहनेवाला मैं (स्वरूप) अनन्त युग, अनन्त ब्रह्मा बीतनेपर भी कभी बदलता नहीं । अतः बदलनेवाले शरीर और न बदलनेवाले अपने-आपको मिलाये नहीं, प्रत्युत अलग-अलग कर लें । बस इतना ही काम है । जब इन दोनोंको मिलाकर देखते हैं, तब अज्ञान हो जाता है; और जब इसको अलग-अलग देखते है तब ज्ञान हो जाता है ।

आप जानते हैं कि बचपनमें मैं जो था, वही मैं आज हूँ । इस ज्ञानको शास्त्रीय भाषामें ‘प्रत्यभिज्ञा’ कहते हैं । इसी ज्ञानको ‘तत्त्वमसि’—‘वही (परमात्मा) तू है’ कहते हैं । ऊँचा-से-ऊँचा महावाक्य भी यही है और साधारण-से-साधारणका अनुभव भी यही है । केवल इसपर दृढ़ रहना है कि जो बदलता है, वह मेरा स्वरूप नहीं है । वृतियाँ बदलती हैं, अवस्थाएँ बदलती हैं, घटनाएँ बदलती हैं, पर मैं बदलनेवाला नहीं हूँ । मैं बदलनेवालेको देखनेवाला हूँ । बदलनेवाला वही देखता है, जो स्वयं न बदलनेवाला होता है । इसलिये मैं सदा रहता हूँ । मेरा स्वरूप कभी बदलता नहीं और शरीर कभी स्थिर रहता नहीं । मैं वही हूँ, पर शरीर वही नहीं है । ऐसे ही परमात्मा वही हैं, पर संसार वही नहीं है । जो सत्ययुग, त्रेता, द्वापर आदि अनन्त युगोंसे पहले थे, वे ही परमात्मा आज हैं । अनन्त युग बदल जायँगे, तो भी परमात्मा वे ही रहेंगे । अतः मैं और परमात्मा एक हैं तथा शरीर और संसार एक हैं ।
छिति जल पावक गगन समीरा । पंच रचित अति अधम सरीरा ॥
(मानस ४/११/२)

भूल यह हुई कि शरीरको तो संसारसे अलग मान लिया कि ‘यह तो मैं हूँ और यह मैं नहीं हूँ’ और अपनेको परमात्मासे अलग मान लिया कि मैं तो यहाँ हूँ और ‘परमात्मा न जाने कहाँ हैं !’ शरीर संसारसे कभी अलग हो ही नहीं सकता । ब्रह्माजीकी भी ताकत नहीं कि शरीरको संसारसे अलग कर दें । जिस धातुका संसार है, उसी धातुका शरीर है । स्थूल-शरीरकी स्थूल-संसारके साथ एकता है, सूक्ष्म-शरीरकी सूक्ष्म-संसारके साथ एकता है । परन्तु हमारी परमात्माके साथ एकता है । हम परमात्माके अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५/७) । परमात्मा और परमात्माका अंश दो नहीं हैं ।


(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘कल्याणकारी प्रवचन’पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

इच्छाके त्याग

और

कर्तव्य-पालनसे लाभ-३

(गत् ब्लॉगसेआगेका)
भगवान् ने सबसे श्रेष्ठ मानव-शरीर दिया है । ऐसे मानव-शरीरका समय श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ कामोंमें लगानेके लिये है । उस समयको बरबाद करना बड़ा भारी नुकसान है । रूपया फिर पैदा किया जा सकता है । जवान बेटा मर जाय तो जो छोटे बालक हैं, वे जवान हो सकते हैं । गृहस्थोंके नये पैदा हो सकते हैं । परन्तु उम्र (समय) किसी भी रीतिसे पैदा नहीं होती, वह तो नष्ट-ही-नष्ट होती है । पैसोंका तो आप बहुत ख्याल रखते हो, एक-एक पैसा सोच-सोचकर, समझ-समझकर खर्च करते हो; और हवाई जहाजको देखनेमें चार-पाँच मिनट खर्च कर देते हो ! क्या फायदा निकला ? बताओ ? स्वास्थ्य सुधार कि समाज सुधरा ? रुपये मिले कि भगवान् मिले ? क्या मिला ? आपको समयरूपी जो असली धन मिला हुआ है, उसको बरबाद क्यों करते हो ? अगर आप सावधान रहो, समयको बरबाद न करके अच्छे-से-अच्छे, उत्तम-से-उत्तम काममें लगाओ तो लोकमें और परलोकमें—दोनों जगह आपकी उन्नति होगी, इसमें सन्देह नहीं है । आप किसी भी क्षेत्रमें जाओ, आपकी उन्नति होगी । नास्तिक-से-नास्तिक मनुष्य भी अगर सोच-समझकर समयका सदुपयोग करे, तो उसकी धारणाके अनुसार, क्रियाके अनुसार उसकी जरूर उन्नति होगी, उसको जरूर सफलता मिलेगी, फिर समयका सदुपयोग करनेसे आस्तिक मनुष्यको भगवान् की प्राप्ति हो जाय, इसमें तो कहना ही क्या है ?

दूसरेका हक मत आने दो । स्त्रीका जो हक है, वह स्त्रीको दे दो । उसका जितना अधिकार है, उसे छीनो मत । उसके प्रति अपना जो कर्तव्य है, उसका पूरा पालन करो । बेटेका जितना हक है, वह उसको दे दो । बेटेके प्रति बापकाजो कर्तव्य है, उसका पूरा पालन करो । माता-पिताने आपको पैदा किया है, आपका पालन-पोषण किया है, आपको शिक्षित बनाया है; अतः उनके प्रति अपने कर्तव्यका पूरा पालन करो । आपपर उनका जो अधिकार है, उसकी रक्षा करो । उनका हक उनको दे दो । कपूत मत कहलाओ । ऐसे ही पड़ोसी है, जिनसे व्यवहार, व्यापार आदि करते हैं, उनका हक मत आने दो । उनके साथ स्नेहका, ईमानदारीका व्यवहार करो । इस तरह हर जगह सावधान रहो । इतने करनेपर भी ऋण अदा नहीं होगा; परन्तु नया ऋण नहीं चढ़ेगा ।

सावधानी रखनेपर ही आपको पता लगेगा कि हम कहाँ-कहाँ दूसरेका हक मार रहे हैं । अभी तो दूसरेके हकका पता ही नहीं लगता । अभी आपसे पूछा जाय तो आप कहेंगे कि हम तो किसीका हक लेते ही नहीं । हम तो ठीक करते हैं । हम पाप करते ही नहीं । मेरेको ऐसे व्यक्ति भी मिले हैं, जो कहते हैं कि ‘भजन करनेकी क्या जरूरत है, हम पाप तो करते ही नहीं । भगवान् का भजन वह करे, जो पाप करता है ।’ उनको होश ही नहीं है, पता ही नहीं है कि पाप क्या होता है, अन्याय क्या होता है । इसलिये हर समय सावधानी रखें कि अभी जो बातें सुनी हैं, इनका हम उम्रभर पालन करेंगे । अब कभी गफलत, भूल नहीं करेंगे ।

अभी मैंने बताया कि पैसोंका, पदार्थोंका सम्बन्ध इच्छा अथवा चिन्तनके साथ नहीं है, उनका सम्बन्ध कर्मोंके साथ है—इस बातको समझनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है । आप कहें कि ऐसे काम कैसे चलेगा ? हम तो गृहस्थी हैं, कई काम धन्धे हैं, इसलिये चिन्तन करना ही पडता है, तो ‘काम कैसे करें, सेवा कैसे करें’—इस तरहका चिन्तन (विचार) करना दोष नहीं है । मुझे रुपये मिल जायँ, वस्तुएँ मिल जायँ—इस तरहका चिन्तन करना दोष है ।

श्रोता—चिन्ता भी हो जाती है महाराजजी !

स्वामीजी—चिन्ता हो जाती है तो चिन्ता छोड़ो और काम करो । चिन्ता करनेसे बुद्धि नष्ट होगी—‘बुद्धिः शोकेन नश्यति ।’ शान्तिपूर्वक विचार करो तो बुद्धि विकसित होगी । चिन्ता करना और चीज है, विचार करना और चीज है । ‘काम किस रीतिसे करें, किस रीतिसे कुटुम्बका पालन करें, किस तरहसे व्यापार करें; किस तरहसे सबके साथ व्यवहार करें’—ऐसा शान्त-चित्तसे विचार करो । विचार करनेसे बुद्धि विकसित होगी । परन्तु चिन्ता करोगे कि ‘हाय, क्या करें ! इतने कुटुम्बका पालन कैसे करें । पैदा है नहीं, क्या करें !’ तो बुद्धि और नष्ट हो जायगी, काम करनेमें भी बाधा लगेगी, फायदा कोई नहीं होगा । इसलिये चिन्ता न करके विचार करो, उद्योग करो, पुरुषार्थ करो, निकम्मे मत रहो । सत्संग करो, पुस्तकें पढ़ो और स्वयं विचार करो अथवा आपसमें विचार-विनिमय करो ।


—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।
इच्छाके त्याग

और

कर्तव्य-पालनसे
लाभ-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)

आप कह सकते है कि बड़ा परिवार है, रोटी-कपड़ेकी भी तंगी है, काम चलता नहीं फिर इच्छा किये बिना कैसे रहें ? तो इच्छा करनेसे वस्तुएँ थोड़े ही मिलेंगी । वस्तुएँ तो काम करनेसे मिलेंगी । इसलिये वस्तुओंकी इच्छा न करके काम करनेकी इच्छा करो । निकम्मे, निरर्थक मत रहो । न्याययुक्त काम करो । झूठ, कपट, बेईमानी, ठगी, धोखेबाजी मत करो । अन्तःकरणमें रुपयोंको महत्त्व मत दो । यह जो लोभ है, संग्रह करनेकी इच्छा है, इसका त्याग कर दो, तो आपका नया प्रारब्ध बन जायगा अर्थात् जो आपके भाग्यमें लिखा नहीं है, वह आपके पास आ जायगा ! परन्तु आपके लोभका त्याग हो जाना चाहिये और इतना दृढ़ निश्चय होना चाहिये कि चाहे मर जायँ पर पाप नहीं करेंगे, अन्याय नहीं करेंगे, झूठ-कपट-जालसाजी नहीं करेंगे । अगर मर भी जायँ तो क्या फर्क पड़ेगा ? मरना तो एक बार है ही; फिर पापकी पोटली साथमें लेकर क्यों मरो ? पापकी पोटली साथमें लिये बिना मर जाओ तो हर्ज क्या है ? अगर पाप किये बिना पैसा नहीं मिलता हो तो भूखे भले ही मर जाओगे, पर नरकोंमें नहीं जाओगे । अगर पाप करके जीओगे तो नरकोंमें जाओगे ही । नरकोंसे बच नहीं सकोगे, ब्रह्माजी भी बचा नहीं सकेंगे । अतः इच्छा कर्तव्यकी करो, निकम्मे मत रहो । इस विषयमें मैं चार बातें कहता हूँ—

(१) अपना सब समय अच्छे-से-अच्छे, ऊँचे-से-ऊँचे काममें लगाओ । निकम्मे मत रहो, निरर्थक समय बरबाद मत करो । ताश-चोपड़, खेल-तमाशा, बीडी-सिगरेट पीना, सिनेमा-नाटक देखना—ये सब फालतू काम हैं, तमोगुणी काम हैं, जिनसे अधोगतिमें (नीच योनियोंमें और नरकोंमें) जाना पड़ेगा—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४/१८) ऐसे व्यर्थ कामोंमें समय मत लगाओ । जिससे शरीरका निर्वाह हो, स्वास्थ्य ठीक रहे, दुनियाका हित हो, परमात्माकी प्राप्ति हो, ऐसे काममें लगे रहो ।

(२) जिस किसी कामको करो, उसको सुचारुरूपसे करो, जिससे आपके मनमें सन्तोष हो और दूसरे भी कहें कि बहुत अच्छा काम करता है । लिखना हो, पढ़ना हो, मुनीमी करना हो, बिक्री करना हो, खरीदारी करना हो आदि-आदि संसारका जो कुछ काम करना हो, उसको बड़े सुचारुरूपसे, सांगोपांग करो । माता-बहनें रसोई बनायें तो अच्छी तरहसे बनायें । सामग्री भले ही कैसी हो, पर चीज बढ़िया बनायें । भोजन ठीक तरहसे परोसें । सबको कैसे सन्तोष हो, सबको किस तरहसे सुख पहुँचे—ऐसा भाव रखकर सब काम करें ।

(३) इस बातका ध्यान रखो कि आपके पास दूसरेका हक न आ जाय । आपका हक दूसरेके पास भले ही चला जाय, पर दूसरेका हक आपके पास बिलकुल न आये ।

(४) अपने व्यक्तिगत जीवनके लिये कम-से-कम खर्चा करो । शरीर-निर्वाहके लिये, खाने-पीनेके लिये, ओढ़ने-पहननेके लिये कम खर्चा करो, साधारणरीतिसे काम चलाओ । ऐश-आराम, स्वाद-शौकीनी मत करो । अगर ऐसे काम करोगे तो आपको घाटा नहीं रहेगा, करके देख लो ।

आजकल लोग कहते हैं कि क्या करें, निठल्ले बैठे हैं, काम नहीं है । यह बिलकुल फालतू बात है । निठल्ले क्यों बैठे हो ? नाम-जप करो, कीर्तन करो, गीता-रामायण आदिका पाठ करो । घरका काम करो—घरमें झाड़ू लगाओ, बरतन धोओ, जुते साफ करो, नालियाँ साफ करो, शौचालय साफ करो । इस तरह कुछ-न-कुछ करते रहो । करना चाहो तो बहुत काम निकल सकता है । काम करनेसे अन्तःकरण निर्मल होगा । ताश-चौपड़ खेलने आदि फालतू कामोंके लिये समय ही नहीं मिलना चाहिये । छुट्टीका दिन हो तो यों ही निकम्मे फिरेंगे, फालतू घूमने चले जायँगे, सिनेमा देखेंगे, खेल करेंगे, पानी उछालेंगे, धक्का देंगे—इस तरह फालतू समय बरबाद करेंगे । यह मानव-शरीरका समय ऐसे बरबाद करनेके लिये नहीं है । तेलीके घरमें तेल होता है तो वह लोटा भरके पैर धोनेके लिये थोड़े ही है !


(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

इच्छाके त्याग

और

कर्तव्य-पालनसे
लाभ-१

श्रोता—आपको आध्यात्मिक लाभ कैसे हुआ ?

स्वामीजी—मुझे तो सत्संगसे लाभ हुआ है । मैं साधनको इतना महत्त्व नहीं देता, जितना सत्संगको देता हूँ । दूसरोंके लिये भी मैं समझता हूँ कि अगर वे मन लगाकर, गहरे उतरकर सत्संगकी बातें समझें तो उनको लाभ बहुत हो सकता है । एक विशेष बात कह देता हूँ कि अगर आप सत्संगको महत्त्व दें और उसको गहरे उतरकर समझें तो मेरेको जितने वर्ष लगे, उतने वर्ष आपको नहीं लगेंगे ! बहुत जल्दी आपकी उन्नति होगी—ऐसा मेरेको स्पष्ट दीखता है, मेरेको सन्देह नहीं है इस बातपर । इस विषयमें मैं आपको अयोग्य, अनधिकारी नहीं मानता हूँ । आपमें जो कमी है, उस कमीको दूर करनेकी सामर्थ्य आपमें पूरी है । मेरी धारणासे आपमें केवल इस विषयकी उत्कण्ठाकी कमी है । वह उत्कण्ठा जाग्रत हो जाय तो आप पापीसे-पापी हों, मूर्ख-से-मूर्ख हों और आपके पास थोड़ा-से-थोड़ा समय हो तो भी आपका उद्धार हो सकता है । उत्कण्ठा जाग्रत् होगी संसारकी लगनका त्याग करनेसे ।

कबीरा मनुआँ एक है, भावे जहाँ लगाय ।
भावे हरि की भगति कर, भावे विषय कमाय ॥

सांसारिक संग्रह और भोगोमें जो लगन लगी है, उसको मिटा दो तो परमात्मप्राप्तिकी सच्ची लगन लग जायगी । इतना रूपया हो गया; इतना और हो जाय; इतना सुख भोग लें, ऐश-आराम कर लें; मान मिल जाय, बड़ाई मिल जाय, नीरोगता मिल जाय, समाजमें मेरा ऊँचा स्थान हो जाय, हम ऐसे बन जायँ—ये जितनी इच्छाएँ हैं, इनका त्याग कर दो तो आपको सच्ची लगन लग जायगी । जितनी लगन लगनी चाहिये, उतनी नहीं लग रही है तो इसका कारण यह है कि जितना त्याग होना चाहिये, उतना नहीं हो रहा है । त्याग क्या है ? गीताने इच्छाके त्यागको ही ‘त्याग’ कहा है । इच्छा क्या है ? ऐसा तो होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये—यह इच्छा है ।

श्रोता—इच्छा किये बिना शरीरका, कुटुम्बका पालन-पोषण कैसे होगा ?

स्वामीजी—पालन-पोषण इच्छासे नहीं होता है । इस बातको समझनेकी कृपा करो । कृपानाथ ! पैसोंका पैदा होना, पदार्थोंका प्राप्त होना इच्छापर बिलकुल निर्भर नहीं है । पदार्थोंकी प्राप्ति होती है पूर्वके कर्मोंसे और अभीके कर्मों-(उद्योगों-) से । कारण कि कर्मोंका और पदार्थोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है । इच्छाका और पदार्थोंका बिलकुल ही सम्बन्ध नहीं है । आपमेंसे कोई भी कह सकता है कि मैंने धनकी इच्छा नहीं की, इसलिये मैं निर्धन रहा । अगर इच्छा कर लेता तो धनवान् हो जाता । वास्तवमें यह बात है ही नहीं । इस बातको आप समझनेकी कृपा करो । इच्छाके साथ पदार्थोंका बिलकुल सम्बन्ध नहीं है । पदार्थोंका सम्बन्ध कर्मोंके साथ है; क्योंकि क्रिया और पदार्थ—ये दोनों ही प्राकृत चीजें हैं, दोनों एक ही तत्त्व हैं । अतः पदार्थोंका सम्बन्ध पूर्वके अथवा वर्तमानके कर्मोंके साथ है । पूर्वके कर्मोंको प्रारब्ध कहते हैं और वर्तमानके कर्मोंको पुरुषार्थ कहते हैं ।

इच्छाके साथ पदार्थोंका सम्बन्ध बिलकुल नहीं है । अगर मैं इच्छा करूँ कि मेरा पालन-पोषण हो जाय, तो क्या इस प्रकार इच्छा करनेसे मेरा पालन-पोषण हो जायगा । आपलोगोंसे कहें कि घण्टाभर आप सब मिल करके यह इच्छा करो कि इसके कुटुम्बका पालन-पोषण हो जाय और इसको एक कौड़ी भी मत दो, तो क्या इसके कुटुम्बका पालन-पोषण हो जायगा ? कदापि नहीं । इच्छाके साथ केवल परमात्माका सम्बन्ध है । अगर परमात्माकी प्राप्तिकी तीव्र इच्छा, उत्कट अभिलाषा हो जाय तो उसकी प्राप्ति हो जायगी ! इसका कारण क्या है ? पदार्थोंका हमारेसे अलगाव है । पदार्थ हमारेसे दूर हैं; देशसे दूर हैं, कालसे दूर हैं, व्यक्तिसे दूर हैं; इसलिये उनकी प्राप्ति कर्मोंसे होगी । परन्तु परमात्मा देशसे दूर नहीं हैं, कालसे दूर नहीं हैं, वस्तुसे दूर नहीं हैं, व्यक्तिसे दूर नहीं हैं । जहाँ हम ‘मैं’ कहते हैं, वहाँ भी परमात्मा परिपूर्ण हैं; इसलिये उनकी प्राप्ति इच्छामात्रसे हो जायगी । परमात्माकी तरह रुपये सब जगह मौजूद नहीं हैं । उनको तो पैदा करना पड़ता है । परन्तु परमात्माको पैदा नहीं करना पड़ता, उनको कहींसे लाना नहीं पड़ता ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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मनुष्यका

वास्तविक सम्बन्ध-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
संसारके साथ हमारा सम्बन्ध केवल सेवा करनेके लिये ही है । सेवाके सिवाय संसारसे और कोई मतलब नहीं । माता- पिताकी सेवा करनी है, स्त्री-पुत्रका पालन-पोषण करना है । सेवा करनी है । उनके साथ सम्बन्ध माननेसे वास्तविक शान्ति नहीं मिलती । शान्ति तो उनकी सेवा करके सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे मिलती है । संसारके साथ माना हुआ ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है, जिसके लिये मनुष्य नींद, भूख और प्यास भी छोड़ दे । परन्तु भगवान् के साथ सम्बन्ध जुड़नेपर नींद अच्छी नहीं लगती, खाना-पीना अच्छा नहीं लगता, यहाँतक कि शरीरका मोह भी नहीं रहता; क्योंकि भगवान् के साथ हमारा सम्बन्ध असली है ।

नारदजीके पूर्वजन्मके वर्णनमें आता है कि जब उनकी माताकी मृत्यु हो गयी, तब वे जंगलकी ओर चल दिये । उनको यह ख्याल ही नहीं आया कि जंगलमें क्या खायेंगे-पियेंगे ? कहाँ रहेंगे ? वहाँ एक वृक्षके नीचे बैठे । उनका मन भगवान् में लगा गया, समाधी लग गयी । उनको अपने हृदयमें भगवान् का रूप दीखने लगा । कुछ देर बाद सहसा समाधी खुल गयी तो वे बड़े व्याकुल हुए । तब आकाशवाणी हुई कि इस शरीर छूटनेके बाद जब ब्रह्माजीके पुत्ररूपसे तुम्हारा जन्म होगा, तब मेरे दर्शन होंगे । ऐसी आकाशवाणी सुनकर नारदजी प्रतीक्षा करने लगे कि कब यह शरीर छूटेगा, कब मैं मरूँगा ! दुनिया चाहती है कि हम सदा जीते ही रहें और वे चाहते है कि मैं मर जाऊँ !

संसारमें अपने शरीरके जीनेकी जितनी इच्छा होती है, उतनी कुटुम्बके जीनेकी इच्छा नहीं होती । गाय अपने बछड़ेपर बहुत स्नेह रखती है । वह बछड़ेको छोडकर जंगलमें चरनेको भी नहीं जाती । परन्तु जब उसको लाठी मारने लगते हैं, तब वह जंगलमें चली जाती है । जंगलमें चरते-चरते जब उसको बछड़ा याद आ जाता है, तब वह ‘हुम्’—ऐसे हुंकार करती है और मुहँसे घास गिर जाता है । शामके समय जब वह वापस लौटती है, तब वह सब गायोंसे आगे भागती है और हुंकार करती हुई बछड़ेके पास जाती है, उसको प्यार करती है, दूध पिलाती है । इस प्रकार उसका बछड़ेपर भी प्रेम है और घासपर भी प्रेम है, पर अपने शरीरपर सबसे ज्यादा प्रेम है । जब शरीरपर लाठी पड़ती है, तब वह बछड़ेको, घासको, सबको छोड़ देती है । जब शरीरपर आफत आती है, तब किसीकी परवाह नहीं करती । तात्पर्य है कि शरीरमें उसका एक नम्बरका प्रेम है, बछड़ेमें दो नम्बरका प्रेम है और घासमें तीन नम्बरका प्रेम है । अतः शरीरसे मोह तो पशुका भी होता है । परन्तु मनुष्य शरीरसे मोह छोडकर भगवान् से प्रेम कर सकता है ।

शरीर तो हरदम बदलता है; अतः यह तो हरदम रहता नहीं, पर भगवान् हरदम रहते हैं । हम तो भगवान् के ही हैं—यह जब पहचान हो जाती है, तब मनुष्य शरीरकी आसक्ति-कामना छोडकर भगवान् में ही लग जाता है । अतः भगवान् के साथ हमारा सम्बन्ध असली है और शरीर-संसारके साथ हमारा सम्बन्ध नकली है—इस वास्तविकताको जानकर सब प्रकारसे भगवान् में ही लग जाना चाहिये ।

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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मनुष्यका

वास्तविक सम्बन्ध-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
कितनी विलक्षण बात है कि संसारके वियोगका अनुभव जीवमात्रको है ! मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सब नींद लेते हैं । तात्पर्य है कि संसारसे वियोग हरेक प्राणी चाहता है । संसारके संयोगमें तो कमीसे भी काम चल सकता है; जैसे—किसीको भोजन अच्छा मिलता है, किसीको भोजन अच्छा नहीं मिलता; किसीको मकान अच्छा मिलता है, किसीको मकान नहीं मिलता, इसमें सबकी विषमता है । दो मनुष्योंकी भी आराम-सामग्री एक समान नहीं होती । परन्तु नींद सबकी एक समान होती है । यहाँ एक बात सोचनेकी है कि नींदकी तरफ हमारी जो प्रवृत्ति होती है, उसमें हमें न कुछ उद्योग करना पडता है, न कुछ चिन्तन करना पडता है, न कुछ काम करना पडता है, न कुछ याद करना पडता है । तात्पर्य है कि कुछ न करनेसे नींद आ जाती है । नींदके लिये ऐसा नहीं है कि इतना उद्योग करो,तब नींद आयेगी !

नींदमें सबसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है । परन्तु संसारके साथ माने हुए सम्बन्धको पकडे हुए ही नींद लेते हैं, इसलिये जगनेपर फिर उसीमें (संसारमें) लग जाते हैं । फिर भी संसारके साथ माना हुआ सम्बन्ध स्थिर नहीं रहता । अवस्था बदल जाती है, व्यक्ति बदल जाते हैं, देश बदल जाता है, काल बदल जाता है—यह सब तो बदल जाता हैं, पर संसारसे सम्बन्ध विच्छेद कभी नहीं बदलता । कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध तो हमारा माना हुआ है, अवास्तविक है, पर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद माना हुआ नहीं है, प्रत्युत वास्तविक है । इसलिये संसारसे निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है । बालकपनसे सम्बन्ध-विच्छेद हुआ, जवानीसे हुआ, वृद्धावस्थासे हुआ, निरोगतासे हुआ, रोगीपनेसे हुआ, धनवत्तासे हुआ, निर्धनतासे हुआ और कई व्यक्तियोंसे संयोग होकर वियोग हुआ । इस प्रकार संसारका सम्बन्ध तो छिन्न-भिन्न होता ही रहता है; क्योंकि यह सम्बन्ध नकली है, माना हुआ है । हमने बड़ी भारी भूल यह की कि माने हुए सम्बन्धको तो सच्चा मान लिया, पर संसारसे जो सम्बन्ध विच्छेद हो रहा है, उसकी तरफ खयाल ही नहीं किया कि यह भी तो हमारा अनुभव है । संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे जितना सुख मिलता है, उतना पदार्थोंसे नहीं मिलता । अगर पदार्थोंसे सुख मिलता, तो नींद छूट जाती ।


जब भगवान् के भजनमें रस आने लगता है, तब नींद, भूख और प्यास भी छूट जाती है, इनकी भी परवाह नहीं रहती । नींद,भूख और प्यास शरीर-निर्वाहकी खास चीजें हैं, पर भजनमें इनको भी भूल जाते हैं । इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा असली सम्बन्ध भगवान् के साथ है । असली सम्बन्ध जाग्रत हो जाय तो फिर नकली सम्बन्धको कौन रखना चाहेगा ? शरीर-संसारके साथ माने हुए नकली सम्बन्धोंको हम छोड़ दें तो आज ही निहाल हो जायँ ! सम्बन्धको छोडकर जाना कहीं नहीं है, न जंगलमें जाना है, न साधु बनना है । केवल यह मान लेना है कि यह संसार वास्तवमें हमारा नहीं है । हमारे तो केवल भगवान् ही हैं । व्यक्तियोंसे हमारा जो सम्बन्ध दीखता है, वह उनकी सेवा करनेके लिये है । वस्तुओंसे हमारा जो सम्बन्ध दीखता है, वह उनको दूसरोंकी सेवामें लगानेके लिये है । न तो हमारे लिये कोई व्यक्ति है और न हमारे लिये कोई वस्तु है । जो हमारे कहलाते हैं, उन माता, पिता, स्त्री, पुत्र, भाई, भौजाई आदिकी सेवा कर दो, बस । वस्तुएँ तो उनकी सेवाके लिये हैं और वे सेवनीय हैं । शरीर उनका ही है, इसलिये शरीरको उनकी सेवामें लगा दो । हमें उनसे कुछ लेना ही नहीं है । उनकी वस्तुओंको उन्हींकी सेवामें लगा देना है । इसीको कर्मयोग कहते हैं—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
(गीता २/४७)

‘कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोमें कभी नहीं । अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो ।’

खूब तत्परतासे, अच्छी तरहसे कर्म करना है; क्योंकि मनुष्य-शरीर सेवा करनेके लिये ही मिला है, भोग भोगनेके लिये नहीं । हमें जो विवेक मिला है, वह शरीरके साथ माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करनेके लिये मिला है, शरीरके साथ चिपकनेके लिये नहीं ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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मनुष्यका


वास्तविक सम्बन्ध-१

संसारसे हमारा सम्बन्ध निरन्तर नहीं रहता—इस वास्तविकताको हम सब जानते हैं । परन्तु इस जानकारीपर हम कायम नहीं रहते—इतनी गलती है । अगर इस जानकारीपर हम कायम रह जायँ अर्थात् संसारसे अपना सम्बन्ध न मानें तो आज, अभी बेड़ा पार है ! हम संसारसे जो अपना सम्बन्ध मानते हैं, उसको छोड़े बिना हम रह ही नहीं सकते । संसारके सम्बन्धक बिना तो हम रह सकते हैं, पर वियोगके बिना हम रह ही नहीं सकते, जी ही नहीं सकते । इस बातपर आप खूब ध्यान देकर विचार करें । संसारकी जिन वस्तुओं, व्यक्तियों, पदार्थोंके साथ हम अपना सम्बन्ध मानते हैं, उनके सम्बन्धसे हमें उतना सुख नहीं मिलता, जितना उनके वियोगसे सुख मिलता है । जैसे हमारेको गाढ़ नींद आती है तो उस समय हमारा किसी व्यक्ति या वस्तुसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता । गाढ़ नींदमें हम सम्पूर्ण वस्तु-व्यक्तियोंको भूल जाते हैं । उनको भुलनेसे जितना सुख मिलता है, उतना सुख उनको याद रखनेसे, उनके साथ रहनेसे नहीं मिलता—यह हम सबका अनुभव है ।

अब ध्यान देकर इस बातको आप ठीक तरहसे समझें । नींद लेनेकी प्रवृत्ति हमारी जन्मसे ही है । आप याद करें तो बचपनसे लेकर आज-दिनतक हम नींद लेते ही रहे हैं अर्थात् संसारको भूलते ही रहे हैं । नींद लिये बिना अर्थात् संसारसे विमुख हुए बिना हम आठ पहर भी जी नहीं सकते । अगर कई दिनतक नींद न आये तो मनुष्य पागल हो जाय । जितनी खुराक नींदसे हमें मिलती है, उतनी खुराक पदार्थों, व्यक्तियोंके सम्बन्धसे नहीं मिलती । पदार्थों, व्यक्तियोंका सम्बन्ध रखनेसे तो थकावट होती है । नींदसे वह थकावट मिटती है और शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरणमें नयी शक्ति, स्फूर्ति, ताजगी आती है । पदार्थों और व्यक्तियोंके सम्बन्धसे ताजगी नष्ट होती है ।

बचपनमें खिलौने जितने अच्छे लगते थे, उतने पदार्थ और व्यक्ति अच्छे नहीं लगते थे । खेल जितना अच्छा लगता था, उतना घर अच्छा नहीं लगता था । अब युवावस्थामें रुपये अच्छे लगने लग गये । अब खिलौने अच्छे नहीं लगते, पर नींद अब भी वैसी-की-वैसी प्रिय लगती है । जब खिलौने प्रिय लगते थे, तब भी नींद अच्छी लगती थी और नींदसे सुख मिलता था । अब रुपये अच्छे लगने लगे तो भी नींद अच्छी लगती है । परन्तु रुपयोंको भुला करके जो नींद आती है, वह नींद रुपयोंसे भी ज्यादा अच्छी लगती है । जब विवाह हुआ तब स्त्री, पुत्र, परिवार बड़ा अच्छा लगने लगा, जिनके लिये रुपये भी खर्च कर देते हैं । परन्तु जब गहरी नींद आने लगती है, तब स्त्रीको, पुत्रको, मित्रोंको, कुटुम्बियोंको भी छोड़ देते हैं । जिनके मोहमें फँसकर झूठ, कपट, बेईमानी, चोरी, ठगी, धोखेबाजी आदि कर लेते हैं, उन सबका गाढ़ नींदमें त्याग कर देते हैं । जब वृद्धावस्था आती है, तब परिवारमें, पोता-पोती, दोहता-दोहतीमें मोह बढ़ जाता है; परन्तु गाढ़ नींद आनेपर इनको भी छोड़ देते हैं । अगर वैराग्य हो जाता है तो धन, मकान, स्त्री, पुत्र, परिवार आदिको छोडकर साधु हो जाते हैं, विरक्त-त्यागी बन जाते हैं, तब भी नींद लेते हैं । नींदमें साधुपनेका भी वियोग होता है, विरक्त-त्यागीपनेका भी वियोग होता है । इस प्रकार प्रत्येक परिस्थितिमें नींद अच्छी लगती है । नींद नहीं आये तो अच्छा है—ऐसा भाव कभी नहीं होता, प्रत्युत नींद आ जाय तो अच्छा है—यह भाव रहता है । नींद लेनेकी पूरी तयारी करते हैं । अच्छा बिछौना बिछाते हैं । खूब बढ़िया तकिया लगते हैं, गद्दा लगते हैं, पंखा लगाते हैं, जिससे आरामसे नींद आ जाय । हल्ला-गुल्ला न हो, ऐसी व्यवस्था करते हैं । जब नींद आने लगती है, तब तरह-तरहके भोग, मनोहर दृश्य, सिनेमा आदि नहीं सुहाते । तब यही कहते हैं कि भाई, अब तो हमें नींद लेने दो; अब हम सोयेंगे । इससे सिद्ध हुआ कि नींद सब वस्तु-व्यक्तियोंसे बढ़कर प्यारी है । नींदके लिये सबका त्याग किया जा सकता है, पर नींदका त्याग नहीं किया जा सकता । परन्तु कहीं भगवान् के भजनमें प्रेम हो जाय, भजनमें रस आने लग जाय, तो फिर नींद भी अच्छी नहीं लगती । संतोंका पद आता है—‘बैरिन हो गई निंदरिया’ अर्थात् यह नींद तो हमारी वैरिन हो गयी; नींद नहीं आये तो अच्छा है । इससे सिद्ध होता है कि जिसके लिये प्यारी-सी-प्यारी नींदका भी त्याग हो जाता है, उस परमात्माके साथ ही हमारा वास्तविक सम्बन्ध है । संसारके साथ हमारा सम्बन्ध बनावटी है, भूलसे माना हुआ है । इसलिये संसारके संयोगके बिना तो हम रह सकते हैं, पर वियोगके बिना हम रह ही नहीं सकते । संसारके वियोगसे सुख होता है—यह हम सबका अनुभव है ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।



परमात्मप्राप्तिकी

सुगमता-२

आप कृपा करके ऐसा मत मानें कि वह ‘है’ दूर है, वह आयेगा अथवा हम उनके पास जायँगे, तब उससे मिलन होगा । नहीं तो भजन करते हुए आप तो समझते हैं कि हम भगवान् के पास जा रहे हैं, पर वास्तवमें भगवान् से अपनेको दूर कर रहे हैं, भगवान् से अपने सम्बन्धके अभावको दृढ़ कर रहे हैं । भगवान् तो फिर मिलेंगे, अभी तो नहीं मिलेंगे—ऐसी धारणा रखते हुए राम-राम जपते हैं, कृपा करके इस धारणाको छोड़ दो । हमें अनुभव नहीं हो रहा है—यह बात मानो तो कोई हर्ज नहीं, पर यह बात दृढतासे मान लो कि भगवान् सब जगह मौजूद हैं । ‘मैं हूँ’—इसमें भी भगवान् हैं, मनमें भी हैं, बुद्धिमें भी हैं, वाणीमें भी हैं । राम-राम-राम—इस आवाजमें भी भगवान् हैं । देखनेमें, सुननेमें, समझनेमें जो कुछ भी आ रहा है, वह सब भगवान् ही हैं । भगवान् कहते हैं—

मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रीयैः ।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिती बुध्यध्वमञ्जसा ॥
(श्रीमद्भागवत ११/१३/२४)

मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे, तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ । मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है—यह सिद्धान्त आपलोग तत्त्वविचारके द्वारा समझ लीजिये ।

अतः ‘भगवान है’—इतना आप मान लो, भले ही उनका अनुभव अभी न हो । सन्त-महात्मा कहते हैं, वेद-पुराण कहते हैं, बड़े-बड़े जानकर कहते हैं कि ‘वह है’ । बस ‘वह है’—ऐसा मानते हुए लगनपूर्वक राम-राम जप करो तो बहुत जल्दी अनुभव हो जायगा । उसका अनुभव कैसे हो ? क्या करूँ ? कैसे करूँ ? किससे पूछूँ ?—यह जिज्ञासा जोरदार हो जाय । राम-नामको छोडो मत; क्योंकि इसके सिवाय संसारमें और कोई सहारा नहीं है । मरनेपर भी कहते हैं—‘राम-नाम सत्य है’ । शरीर-संसार असत् है । अतः राम-राम करते रहो । ‘र’ में, ‘आ’ में, ‘म’ में, जीभमें, मनमें, स्फुरणामें, चिन्तनमें, बुद्धिमें, मैंपनमें—सब जगह वह परमात्मा परिपूर्ण है । जो सबमें रमण करता है और जिसमें सभी रहते हैं, उसका नाम ‘राम’है ।

राम-नामका जप बहुत ही महान् और सुगम है साधन है । कल लकवेकी बीमारीवाले एक भाई मिले थे, वे और कुछ नहीं बोल सकते थे, केवल राम-राम बोल सकते थे । उनसे भी पहले एक भाई कलकत्तामें मिले थे, वे भी कुछ नहीं बोल सकते थे, केवल ‘राम’—इतना कह सकते थे । राम-नाम लोकमें, परलोकमें सब जगह शान्ति देनेवाला, सबको सुख देनेवाला है ।

सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू । लोक लाहु परलोक निबाहू ॥
(मानस १/२०/१)

आप यह बात चाहे श्रद्धासे मान लो, चाहे विश्वाससे मान लो, चाहे युक्तिसे मान लो, चाहे अनुभवसे मान लो, चाहे सोच-समझकर मान लो कि परमात्मा सब जगह हैं; जहाँ आप हो, वहीं परमात्मा हैं । आपकी एकता परमात्माके साथ है,बदलनेवाले शरीरके साथ नहीं । शास्त्र भी डंकेकी चोटसे कहता है कि परमात्मा सब जगह हैं, सबमें हैं, सबके अपने हैं, सबके सुहृद् हैं । आप इसको दृढतासे मान लो । साधकसे बड़ी भूल यह होती है कि वह ‘भजन’ करेंगे, फिर परमात्मा मिलेंगे—ऐसा मान लेता है । यह भविष्यकी आशा ही महान् बाधक है । शास्त्रोंसे, सन्तोंके कहनेसे, किसीके कहनेसे यह मान लो कि परमात्मा तो मिले हुए ही हैं, केवल हमें दिखते नहीं । वर्तमानमें परमात्माका अभाव स्वीकार मत करो । अपनेको उनका अनुभव नहीं हो रहा है; अतः अनुभव कैसे हो—इसके लिये रात-दिन राम-राम रटना शुरू कर दो । फिर देखो तमाशा ! कितना जल्दी अनुभव होता है ।

जो जिव चाहे मुक्ति को, तो सुमिरीजै राम ।
हरिया गैले चालतां, जैसे आवै गाम ॥



—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

परमात्मप्राप्तिकी

सुगमता-१

मैं जो बात कहता हूँ, उसको आप कृपा करके मान लें । मैं ऐसी बात कहता हूँ, जो आपकी जानी हुई है । कोई नयी बात नहीं बताता हूँ । कोई भाई-बहन क्या ऐसा जानता है कि मैं पहले नहीं था और पीछे नहीं रहूँगा ? यह प्रश्न स्वयंके विषयमें हैं, शरीरके विषयमें नहीं । शरीर तो पैदा होनेसे पहले नहीं था और मरनेके बाद नहीं रहेगा । परन्तु मैं पहले नहीं था और पीछे नहीं रहूँगा तथा अब भी मैं नहीं हूँ—ऐसे अपने अभावका अनुभव भी किसीको होता है क्या ? अपने अभावका अनुभव किसीको कभी नहीं होता । मैं क्या था, क्या रहूँगा, क्या हूँ—ऐसा विचार तो हो सकता है, पर ‘मैं हूँ कि नहीं हूँ ?’—ऐसा विचार, सन्देह कभी नहीं होता ।

‘मैं हूँ’—यह जो अपनी सत्ता, अपना होनापन है, उसका कभी किञ्चिन्मात्र भी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २/१६) जिसका कभी अभाव नहीं होता, उसमें कभी कमी नहीं आती । जिसमें कोई कमी नहीं आती, उसके लिये क्या चाहिये ? कुछ नहीं चाहिये । कारण कि चाहना तो कमीमें ही होती है । जिसका कभी अभाव नहीं होता, जिसमें कभी कमी नहीं आती, जो नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है, उसके लिये करना क्या बाकी रहा ? जानना क्या बाकी रहा ? पाना क्या बाकी रहा ? परन्तु उस ‘है’ में स्थित न होकर, जो प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है, उस शरीरमें आप स्थित हो जाते हैं, तब करना भी बाकी रहता है, जानना भी बाकी रहता है और पाना भी बाकी रहता है ।

इस बातको भी आप जानते हैं कि शरीर प्रतिक्षण बदलता है, कभी भी एकरूप नहीं रहता । अगर शरीर एकरूप रहता, तो बचपनका शरीर अभी भी रहना चाहिये था । परन्तु बचपनका शरीर अभी नहीं है—यह सबका अनुभव है । बचपनका शरीर किसी एक दिनमें, एक महीनेमें अथवा एक वर्षमें नहीं बदला है, प्रत्युत प्रत्येक वर्षमें, प्रत्येक महीनेमें, प्रत्येक दिनमें, प्रत्येक घण्टेमें, प्रत्येक मिनटमें और प्रत्येक सेकण्डमें बदलता है । अतः केवल बदलनेके पुञ्जका नाम शरीर है । शरीरादि पदार्थ स्थूल बुद्धिसे दीखते हैं । सूक्ष्म बुद्धिसे देखें तो केवल परिवर्तन-ही-परिवर्तन दीखेगा, वस्तु नहीं दिखेगी । जैसे पंखा चलता है तो गोल चक्कर दीखता है, पर वास्तवमें गोल चक्कर नहीं है । पंखेकी ताड़ी अलग-अलग है, पर तेजीसे घुमनेके कारण गोल चक्कर दीखता है । ऐसे ही बदलनेके कारण पदार्थ, शरीर दीखता है । यह शरीर है—ऐसा कहनेमें तो देरी लगती है, पर इसके बदलेमें देरी नहीं लगती । यह तो हरदम बदलता रहता है । परन्तु स्वयं (स्वरूप) नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है । नित्य-निरन्तर रहनेवाले स्वयंको जब प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरके साथ मिला लेते हैं, तब कामना, इच्छा, वासना, तृष्णा आदि पैदा होती हैं । इसीसे सब अनर्थ होते हैं ।

अगर हम नित्य-निरन्तर रहनेवाले नहीं होते, तो पहले किये हुए कर्मोंका फल आगे किसको भोगना पड़ेगा ? हम पहले थे, तभी तो पहले किये हुए कर्मोंका फल अब भोग रहे हैं; और हम आगे रहेंगे, तभी तो अभी किये हुए कर्मोंका फल आगे भोगना पड़ेगा । पहले हमने जो कर्म किये थे, वे परिवर्तनशील शरीरके साथ मिलकर ही किये थे और अब उनका फल भी शरीरके साथ मिलकर ही भोगेंगे । अगर हम शरीरके साथ न मिलें तो न पहलेका कर्म स्पर्श करेगा, न अभीका कर्म स्पर्श करेगा और न भविष्यका कर्म स्पर्श करेगा । कारण कि ‘है’ में कभी अभाव नहीं होता और अभाव हुए बिना उसमें दूसरी वस्तुका स्पर्श नहीं होता, प्रवेश नहीं होता । वह ‘है’ सदा ज्यों-का-त्यों रहता है, इसलिये उसका अनुभव करनेवाले महापुरुषोंने कहा है—

है सो सुन्दर है सदा, नहिं सो सुन्दर नाहिं ।
नहिं सो परगट देखिये, है सो दीखे नाहिं ॥

‘है’ तो सबका द्रष्टा है, वह दीखे कैसे ? आँखसे सबको देखते हैं, पर आँख नहीं दीखती, परन्तु जिससे देखते हैं, वही आँख है । इसी प्रकार हम ‘है’ को अर्थात् अपने होनेपनको देख नहीं सकते; परन्तु जिससे यह सब दिख रहा है, वही ‘है’ है । इस बातको आप मान लें । आप कह सकते हैं कि हमें उसका अनुभव नहीं हो रहा है । अतः उसके अनुभवके लिये आप जिज्ञासा करें, व्याकुल हो जायँ ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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भगवत्प्राप्ति

क्रियासाध्य नहीं-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
भगवान् हमारे हैं और हम भगवान् के हैं—यह सच्ची बात है । इसलिये भजन-ध्यान करते हुए इस बातको विशेषतासे याद रखें कि भगवान् अभी हैं, यहाँ हैं, मेरेमें हैं और मेरे हैं । अब निराशाकी जगह ही कहाँ है ? जैसे बालक मानता है कि माँ मेरी है, तो वह माँ पर अपना हक लगता है, पूरा अधिकार जमाता है । माँ इधर-उधर देखती है तो उसकी ठोड़ी पकडकर कहता है कि तू मेरी तरफ ही देख, बस । अतः माँको उसकी तरफ देखना पडता है । ऐसे ही हम भगवान् से कह दें कि हम तुम्हारे हैं, तुम हमारे हो, इसलिये मेरी तरफ ही देखो । सन्तोनें कहा है—‘न मैं देखूँ और को, न तोहि देखन देउँ ।’ मैं औरको देखूँगा नहीं और तेरेको भी दूसरी तरफ देखने दूँगा नहीं । ऐसा होनेपर भगवान् वशमें हो जायँगे । हम जो दूसरी तरफ देखते हैं, यही बाधा है ।

एक बानि करुणानिधान की । सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥
(मानस ३/१०/४)

इसलिये कोई कैसा ही हो, उसको भगवान् की तरफसे निराश नहीं होना चाहिये । आपका विश्वास न बैठे तो जप करो, कीर्तन करो, सब कुछ करो और विश्वास बैठे तो भी सब कुछ करो; क्योंकि यह तो करनेकी चीज है ! परन्तु जप-ध्यान आदिके द्वारा भगवान् पर कोई कब्ज़ा कर ले—यह बात नहीं है । हम अपने-आपको देकर ही उनपर कब्ज़ा कर सकते हैं । हम अपने-आपको संसारको दे रखा है, इसलिये दुःख पा रहे है । अगर अपने-आपको भगवान् को दे दें, तो निहाल हो जायँ ।

बिलकुल शास्त्र-सम्मत बात है कि क्रियाओंके द्वारा भगवान् पर कब्जा नहीं कर सकते । कितनी ही योग्यता प्राप्त कर लें, उनपर अधिकार नहीं जमा सकते । कारण कि इनके द्वारा अधिकार उसीपर होता है, जो इनसे कमजोर होता है । सौ रुपयोंके द्वारा हम उसी चीजपर कब्जा कर सकते हैं, जो सौ रुपयोंसे कम कीमतकी है । कोई चीज सौ रुपयोंकी है तो हम एक सौ पचीस रुपये देकर उस चीजपर कब्जा कर सकते हैं । ऐसे ही भगवान् को किसी योग्यतासे खरीदेंगे, तो उस योग्यतासे कमजोर भगवान् ही मिलेंगे । अतः ये विरक्त हैं, ये त्यागी हैं, ये विद्वान हैं, ये बड़े हैं, इनको भगवान् मिलेंगे हमारेको नहीं—यह धारणा बिलकुल गलत है । अगर आप भगवान् के लिये व्याकुल हो जाओ, उनके बिना न रह सको, तो बड़े-बड़े पण्डित और बड़े-बड़े विरक्त तो रोते रहेंगे, पहले आपको भगवान् मिलेंगे । आप भगवान् के बिना रह नहीं सकोगे तो भगवान् भी आपके बिना रह नहीं सकेंगे । इसलिये परमात्माकी तरफसे किसीको कभी किंचिन्मात्र भी निराश नहीं होना चाहिये और संसारकी आशा नहीं रखनी चाहिये । कारण कि संसार आशामात्रसे नहीं मिलेगा । अगर मिल भी जायगा तो टिकेगा नहीं । अगर यह टिक भी जायगा तो आपका शरीर नहीं टिकेगा । संसार अभावस्वरूप हैं, इसलिये उसका सदा अभाव ही रहेगा । परमात्मा भाव-स्वरूप हैं, इसलिये उनका सदा भाव ही रहेगा, अभाव कभी होगा ही नहीं—यह सिद्धान्त है ।


—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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भगवत्प्राप्ति

क्रियासाध्य नहीं-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
भगवान् ने अपनेको प्राणिमात्रका सुहृद कहा है—‘सुहृदं सर्वभूतानां’ (गीता ५/२९), तो क्या दुष्ट-से-दुष्ट मनुष्यके भी भगवान् सुहृद नहीं हैं ? मैं कैसा ही क्यों न हूँ, क्या भगवान् मेरे सुहृद नहीं हैं ? अगर उनमें पक्षपात है तो वे भगवान् कैसे ? मैं दुष्ट हूँ, ज्यादा अयोग्य हूँ तो भगवान् की कृपा मेरेपर अधिक होगी—

‘पापी हुलास विशेषी अबकी बेर उबारियो ।’
(करुणासागर)

पापीके मनमें अधिक आनन्द होता है; क्योंकि भगवान् पतित-पावन हैं । इसलिये उनपर पतितोंका ज्यादा हक लागत है । माँ अपने अयोग्य लड़केका ज्यादा खयाल रखती है, तो क्या भगवान् मेरा खयाल नहीं रखेंगे ? वे मेरेपर कृपा न करें—यह हो ही नहीं सकता । इसलिये भजन-ध्यान करते हुए, नाम-जप करते हुए इस बात पर विशेष ध्यान दें कि जिह्वामें, नाममें, श्वासमें, मनमें, बुद्धिमें, अन्तःकरणमें, शरीरमें सब जगह परमात्मा परिपूर्ण हैं, पूरे-के-पूरे विद्यमान हैं । वे सबमें लबालब भरे हुए हैं । अब यह शंका होती है कि जब वे परमात्मा सबमें हैं, सब जगह मौजूद हैं तो फिर नाम-जप क्यों करते हैं ? नाम-जपके बिना हमारेको संतोष नहीं होता; इसलिये करते हैं । सनकादि ऋषियोंकी बात आपने सुनी होगी । वे चारों भाई एक समान ही ब्रह्मज्ञानी हैं । उनमें एक तो भगवान् की कथा सुनाता है और बाकीके तीन कथा सुनाते हैं । इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी होते हुए भी वे भगवान् की कथा कहते रहते हैं; क्योंकि भगवान् की कथा ही ऐसी है—

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रथा अप्युरुक्रमे ।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥
(श्रीमद्भागवत १/७/१०)

ज्ञानके द्वारा जिनकी चित्-जड-ग्रन्थि कट गयी है, ऐसे आत्माराम मुनिगन भी भगवान् की निष्काम भक्ति किया करते हैं, क्योंकि भगवान् के गुण ही ऐसे हैं कि वे प्राणियोंको अपनी और खींच लेते हैं ।

भगवान् हैं ही ऐसे कि उनके भजनके बिना साधक रह नहीं सकता । उतना रस, उतना आनन्द कहीं है ही नहीं । इसलिये हम उनका भजन करते हैं । भजनके द्वारा हम भगवान् को खरीद लेंगे—ऐसा भाव मत रखना । भगवान् तो अपनी कृपासे ही पधारते हैं । भजन-ध्यान, नाम-जप, कीर्तन आदिमें हमारा अनन्य प्रेम होना चाहये । कारण कि हमने संसारमें आसक्ति, प्रियता करके बड़ी भारी गलती की है । अब इस गलतीके संशोधनके लिये हमें भजन-ध्यान, नाम-जप आदि करना है । परमात्मा भजन-ध्यान आदिके अधीन हैं—ऐसी बात नहीं है । भगवान् स्वयं कहते हैं—

‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।’
(गीता ११/५३)

अर्थात् मैं वेदाध्ययन, तप, दान, यज्ञ आदिके द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता । उपनिषदोंमें आता हैं—

‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।’
(कठोपनिषद १/२/२३)

अर्थात् प्रवचनसे, पण्डिताईसे, बहुत शास्त्रोंका बोध होनेसे परमात्मा नहीं मिलते । इसका आप उलटा अर्थ मत लेना कि सत्संग सुनना, पढ़ना, शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करना खराब है । इनको तो करते ही रहना है । कहनेका भाव यह है कि इनके द्वारा भगवान् के ऊपर कब्जा नहीं कर सकते, अधिकार नहीं जमा सकते । जैसे, किसी वस्तुकी जो कीमत होती है, वह कीमत पूरी देनेपर उस वस्तुपर हमारा अधिकार हो जाता है । परन्तु भगवत्प्राप्तिके विषयमें ऐसी बात नहीं है । साधन करके भगवान् पर अधिकार नहीं किया जा सकता । उनपर अधिकार करनेका भी एक तरीका है । वह तरीका यह है कि सर्वथा भगवान् का ही हो जाय । तन, मन, वचन, विद्या, बुद्धि, अधिकार आदि किसीका भी किंचिन्मात्र भी सहारा न लेकर केवल भगवान् का ही हो जाय, तो भगवान् उसके वशमें हो जायँगे । परन्तु हमने साधना की है, हमने जप किया है, हमने कीर्तन किया है, हमने अभ्यास किया है, हम गीताको जानते हैं, हम अनेक शास्त्रोंको जानते हैं—ऐसी हेकड़ीसे भगवान् वशमें हो जायँ, यह असम्भव बात है । भगवान् वशमें होते हैं तो कृपा-परवश ही होते हैं । उनकी कृपा उसीपर होती है है, जो सर्वथा उनका हो जाता है । वे सस्ते हैं तो इतने सस्ते है कि ‘हे नाथ ! मैं आपका हूँ ।’—इतना सुनते ही भगवान् कहते हैं कि ‘हाँ बेटा ! मैं तेरा हूँ ’ आप कितनी ही विद्या, बुद्धि, योग्यता आदि लगा लो, उससे आपका ज्ञान बढ़ सकता है, आपमें पवित्रता आ सकती है, पर उससे भगवान् वशमें हो जायँ—यह बात नहीं होगी ।


(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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भगवत्प्राप्ति


क्रियासाध्य नहीं-१


एक विशेष बात ध्यान देनेकी है कि जिसको मुक्ति, कल्याण अथवा भगवत्प्राप्ति कहते है, वह स्वतःसिद्ध है, क्रियाके द्वारा सिद्ध होनेवाली चीज नहीं है । यह बहुत विलक्षण बात है ! आप कृपा करके इस बातकी तरफ ध्यान दें । संसारकी जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब प्रकृतिका कार्य होनेसे उनमें हरदम परिवर्तन होता रहता है । क्रियाशील होनेसे उन वस्तुओंकी प्राप्ति भी कर्मोंके द्वारा होती है । अतः संसारकी वस्तुएँ क्रियासाध्य हैं । परन्तु परमात्मतत्त्व सदा ज्यों-का-त्यों रहता है, उसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता । अतः परमात्मतत्त्व क्रियासाध्य नहीं है । सिद्धान्तकी एक बहुत बढ़िया और सूक्ष्म बात यह है कि परमात्मतत्त्व स्वतःसिद्ध है । वह क्रियाओंके द्वारा प्रापणीय नहीं है । यह बात विशेष ध्यान देनेकी है । आपका ध्यान आकृष्ट करनेके लिये कहता हूँ कि यह बात मेरेको बहुत वर्षोंके बाद सन्तोंसे मिली है । यह बात सर्वशास्त्रसम्मत भी है । अतः केवल इस बातकी तरफ ही आप ध्यान दें तो बहुत ही लाभकी बात है । अब इसका खुलासा कहता हूँ, आप ध्यान दें ।

हम यह मानते हैं कि परमात्मा सब समयमें हैं, सब जगहमें हैं, सभीके हैं और सबके हैं । अब इन चारों बातोंपर विचार करें । (१) परमात्मा सब समयमें हैं कि नहीं ? अगर इस समय नहीं हैं, तो परमात्मा सब समयमें हैं—यह कहना नहीं बनेगा । (२) परमात्मा सब जगह हैं तो यहाँ है कि नहीं ? अगर यहाँ नहीं हैं, तो परमात्मा सब जगह हैं—यह कहना नहीं बनेगा । (३) परमात्मा सभीमें हैं । वे जड़-चेतन, स्थावर-जंगम आदि सभीमें हैं । सजीवके दो भेद हैं—स्थावर और जंगम । वृक्ष आदि स्थावर हैं और मनुष्य, पशु-पक्षी आदि जंगम हैं । जड़-चेतनमें, स्थावर-जंगममें परमात्मा हैं । नीचे-से-नीचे समझे जानेवाले प्राणीमें तथा दुष्ट-से-दुष्ट आचरणवाले मनुष्यमें भी परमात्मा हैं । सन्त-महात्माओंमें भी परमात्मा हैं । शुद्ध-से-शुद्ध वस्तुमें तथा अपवित्र-से-अपवित्र वस्तुमें भी परमात्मा हैं । नरकोंमें भी परमात्मा परिपूर्ण हैं । जब वे सबमें हैं तो हमारेमें हैं कि नहीं ? अगर हमारेमें नहीं हैं, तो परमात्मा सबमें हैं—यह कहना नहीं बनेगा । (४) परमात्मा सबके हैं । यह नहीं कि वे साधुओंके हैं, गृहस्थोंके नहीं; भाइयोंके हैं, बहनोंके नहीं; ब्राह्मणोंके हैं, अन्त्यजोंके नहीं । ऐसा आप नहीं कह सकते है कि परमात्मा किसी व्यक्तिविशेषके हैं । परमात्मा दुष्ट-से-दुष्ट पुरुषके भी वैसे ही हैं, जैसे महात्मा-से-महात्मा पुरुषके हैं । परमात्मापर महात्मा-से-महात्माका जैसा हक लगता है, वैसा ही हक दुष्ट-से-दुष्टका भी लगता है । उनमें कभी किंचिन्मात्र भी पक्षपात नहीं है । उनमें पक्षपात हो ही नहीं सकता, असम्भव बात है । अतः परमात्मा सबके हैं, तो हमारे भी हैं । अगर वे हमारे नहीं है, तो परमात्मा सबके हैं —यह कहना नहीं बनेगा । अब सिद्ध क्या हुआ ? कि परमात्मा सब समयमें हैं तो अभी भी हैं, सब जगह हैं तो यहाँ भी हैं, सभीमें हैं तो मेरेमें भी हैं और सबके हैं तो मेरे भी हैं ।

उपर्युक्त चार बातोंकी तरफ ध्यान देनेसे एक बात सिद्ध होती है कि परमात्मा हमें नित्यप्राप्त हैं । हम भगवान् का भजन करते हैं, नाम-जप करते हैं, कीर्तन करते हैं, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थ पढते हैं, सन्तोंकी वाणी पढ़ते हैं, तो यह भाव रहता है कि परमात्मा फिर मिलेंगे । अभी हम परमात्माकी प्राप्तिके योग्य नहीं हुए हैं, इसलिये परमात्मा अभी नहीं मिलेंगे, भविष्यमें मिलेंगे । यह धारणा साधकोंके लिये महान बाधक है । मनमें तो वे समझते हैं कि हम भगवान् की तरफ चल रहे हैं, पर वास्तवमें भगवान् से अलग होनेका उद्योग कर रहे हैं । यह चिन्तन कर रहें हैं अभी भगवान् नहीं मिलेंगे । अभी कैसे मिल जायँगे ? मैं योग्य नहीं हूँ, मैं पात्र भी नहीं हूँ । साधकके लिये यह धारणा महान पतन करनेवाली है । विचार करना चाहिये कि क्या हमारी अपात्रतासे भगवान् अटक सकते हैं ? क्या भगवान् इतने कमजोर हैं कि हम अयोग्य हैं, इसलिये वे हमें नहीं मिल सकते ? अगर ऐसी बात है तो फिर उनको दयालु कहना ही निरर्थक है । जब वे योग्यको मिलते हैं, अयोग्यको नहीं मिलते, तो फिर दयाका क्या लेना-देना ?

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
परमात्मा

तत्काल

कैसे मिले ?-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
श्रोता—दूसरी लालसा किसपर टिकी हुई है ?

स्वामीजी—दूसरी लालसाएँ संयोगजन्य सुखभोगकी लालासपर टिकी हुई हैं । संयोगजन्य सुखभोगकी जो लालसा है, मनमें जो रुचि है, यही बाधक है; सुख इतना बाधक नहीं है । असली बीमारी कहाँ है—इस बातका हमें तो कई वर्षोंतक पता नहीं लगा था । व्याख्यान देते-देते कई वर्ष बीत गये तब पता चला कि मनमें संयोगजन्य सुखकी जो लोलुपता है । यहाँ है वह बीमारी ! हमें सुख मिल जाय—बस, इस इच्छामें ही सब बाधाएँ हैं । यही अनर्थका मूल है, यही जहर है ।

श्रोता—संयोगजन्य सुखकी लालसा कैसे छूटे ?

स्वामीजी—इसके छुडानेका बड़ा सरल उपाय है । परन्तु इसको छोड़ना है—इतनी इच्छा आपके घरकी, स्वयंकी होनी चाहिये; क्योंकि इसके बिना कोई उपाय काम नहीं देगा । इसको हम छोड़ना चाहते हैं—इतने आप तैयार हो जाओ तो ऐसा सरल उपाय मेरे पास है है, जिससे बहुत जल्दी काम बन जाय ! मैंने जो पुस्तकोंमें पढ़ा है, सन्तोंसे सुना है, वह बात कहता हूँ । भाई-बहनोंके लिये, पढ़े-लिखे और अनपढ़ आदमियोंके लिये, छोटे-बडोंके लिये, सबके लिये सीधा सरल उपाय है कि दूसरोंको सुख कैसे पहुँचे ? दूसरोंको आराम कैसे मिले ? दूसरोंका भला कैसे हो ? —यह लालसा लग जाय तो अपने सुखकी लालसा छूट जायगी । करके देख लो, नहीं तो फिर मेरेसे पूछो कि यह तो हुआ नहीं ! युक्तिसंगत न दीखे तो कह दो कि यह युक्तिसंगत नहीं दीखता !

श्रोता—इसमें प्रारब्धकी बाधा है कि नहीं ?

स्वामीजी—इसमें प्रारब्धकी कोई बाधा नहीं है । इसमें प्रारब्ध मानना तो केवल बहानेबाजी है । प्रारब्ध ऐसा ही है, समय ऐसा ही आ गया, ईश्वरने कृपा नहीं की, अच्छे गुरु नहीं मिले, अच्छे महात्मा नहीं मिले, कोई बतानेवाला नहीं मिला, हमारा भाग्य ऐसा ही है—यह सब बहानेबाजी है, केवल परमात्मतत्त्वसे वञ्चित रहनेका उपाय है ।

ऐसा भी कभी हो सकता है कि ईश्वर अपनी प्राप्तिमें बाधा दे दे ? अथवा हमारा किया हुआ कर्म हमें बाधा दे ? या हमारी बनायी हुई वासना हमें बाधा दे दे ? कर्म हमने स्वयं किये हैं, वासनाएँ हमने स्वयं बनायीं है । जो चीज हमने पैदा कि है, उसको हम मिटा सकते हैं । गुरु कोई नहीं मिला तो गुरुकी जरूरत ही नहीं है । कोई महात्मा नहीं मिला तो महात्माकी जरूरत ही नहीं है । भगवान् ने जब अपनी प्राप्तिके लिये मनुष्य-शरीर दिया है तो अपनी प्राप्तिकी सामग्री कम दी है क्या ? अगर गुरुकी जरूरत होगी तो भगवान् को स्वयं गुरु बनकर आना पड़ेगा ! वे जगद्गुरु हैं—‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।’ अच्छे महात्मा संसारमें क्यों रहते हैं ? तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुष संसारमें जीते हैं, तो क्यों जीते हैं ? संसारमें आकर उन्हें जो काम करना था, वह काम तो उन्होंने पूरा कर लिया; अतः उनको उसी वक्त मर जाना चाहिये था ! परन्तु वे अब जीते हैं तो केवल हमारे लिये जीते हैं । उनपर हमारा पूरा हक लगता है । जैसे बालक दुःख पा रहा है तो माँ जीती क्यों है ? माँ तो बालकके लिये ही है, नहीं तो मर जाना चाहिये माँको ! जरूरत नहीं है उसकी ! ऐसे ही वे महात्मा पुरुष संसारमें जीते हैं, तो केवल जीवोंके कल्याणके लिये जीते हैं । इसीलिए महात्मा हमें नहीं मिलेंगे तो वे कहाँ जायँगे ? उनको मिलना पड़ेगा, झख मारकर आना पड़ेगा; अगर हम सच्चे हृदयसे परमात्माको चाहते हैं, तो गुरुकी जरूरत होनेपर गुरु अपने-आप आ जायगा । भगवान् गुरुको भेज देंगे । ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं । यह एकदम सच्ची बात है । इसलिये प्रारब्ध और कर्म कुछ भी बाधक नहीं है । परमात्मप्राप्तिकी एक प्रबल इच्छा हो जाय तो अनन्त जन्मोंके पाप भस्म हो जायँगे ।

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

परमात्मा

तत्काल

कैसे मिले ?-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
आपकी स्थिति परमात्मामें है । संसारमें आपकी स्थिति है ही नहीं । आपकी स्थिति तो अटल है और संसार आपके सामने बदलता है । संसारमें आपकी स्थिति है ही कहाँ ? बालकपन बदला, जवानी बदली, निरोग-अवस्था बदली, वृद्धावस्था बदली, रोग-अवस्था बदली, निरोग-अवस्था बदली, धनवत्ता बदली, निर्धनता बदली—ये सब बदलते रहे, पर आप वे-के-वे ही रहे । संसार आपके साथ कभी रह ही नहीं सकता और आप संसारके साथ कभी रह ही नहीं सकते । ब्रह्माजीकी भी ताकत नहीं है कि संसार आपके साथ और आप संसारके साथ रह जायँ । आपकी स्थिति सदा परमात्मामें रहती है । परमात्मा सदा आपके साथ रहते हैं और आप सदा परमात्माके साथ रहते हैं । अतः परमात्माकी प्राप्ति कठीन है ही नहीं । कठीन तो तब हो, जब परमात्माकी प्राप्तिके लिये कुछ करना पड़े । जब करना कुछ है ही नहीं, तब उसकी प्राप्ति कठीन कैसे ! कठिनता और सुगमताका सवाल ही नहीं है ।

श्रोता—बात तो यह ठीक जँचती है पर .....।

स्वामीजी—ठीक जँचती है तो मना कौन करता है ? आड़ तो आपने खुद ही लगा रखी है । वास्तवमें आपको परमात्मप्राप्तिकी परवाह ही नहीं है, चाहे प्राप्ति हो अथवा न हो !

संतदास संसार में , कई गुग्गु कई डोड ।
डूबन को साँसो नहीं, नहीं तिरन को कोड ॥

—गुग्गु (उल्लू-) को तो दिनमें नहीं दीखता और डोड-(एक प्रकारका बड़ा कौआ-) को रातमें नहीं दीखता । परन्तु संसारमें कई ऐसे लोग हैं, जिनको न दिनमें दीखता है और न रातमें दीखता है अर्थात् अपने उद्धारकी तरफ उनकी दृष्टि कभी जाती ही नहीं । उनमें न तो अपने डूबने-(पतन होने-) की चिन्ता है और न तैरने-(अपने उद्धार करने-) का उत्साह है ।

केवल यह लालसा हो जाय कि परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो ? क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किससे पूछूँ ? यह लालसा जोरदार लगी कि परमात्माकी प्राप्ति हुई ! क्योंकि यह लालसा लगते ही दूसरी लालसाएँ छूट जाती हैं । जबतक दूसरी सांसारिक लालसाएँ रहती हैं तबतक एक अनन्य लालसा नहीं होती । परमात्मा अनन्य हैं; क्योंकि उनके समान दूसरा कोई है ही नहीं, इसलिये उनकी प्राप्तिकी लालसा भी अनन्य होनी चाहिये ।

श्रोता—परमात्माकी लालसा बनानी पड़ती है कि स्वतःसिद्ध है ?

स्वामीजी—परमात्माकी लालसा स्वतःसिद्ध है, दूसरी लालसाएँ आपने बनायी हैं । अतः उन लालासओंको छोड़ना है । अभी आप जिन लालासओंको जानते हो, आजसे पचास वर्ष पहले उनको जानते थे क्या ? जानते ही नहीं थे । इसलिये वे लालसाएँ बनावटी हैं । एक क्षण भी कोई लालसा टिकती नहीं, प्रत्युत बदलती रहती है, मिटती रहती है और आप नयी-नयी लालसा पकडते रहते हो ।

श्रोता—परमात्मप्राप्तिकी अनन्य लालसाके बिना भी परमात्मप्राप्ति हो सकती है क्या ?

स्वामीजी—परमात्मप्राप्तिकी अनन्य लालसाके बिना, दूसरी लालसा रहते हुए भी उद्योग किया जा सकता है, भजन-स्मरण किया जा सकता है । परन्तु यह लम्बा रास्ता है, इससे तत्काल परमात्मप्राप्ति नहीं होगी । एक-दो जन्म, दस जन्म, पता नहीं कितने जन्ममें हो जाय तो हो जाय ! दूसरी लालसा रहनेसे ही तो हम अटके पड़े हैं, नहीं तो अटकते क्या ? जो सत्संगमें लगे हुए हैं, उनमें कुछ-न-कुछ पारमार्थिक लालसा है ही; परन्तु अनन्य लालसा न होनेसे ही परमात्मप्राप्तिमें देरी हो रही है ।

वास्तवमें देखा जाय तो पारमार्थिक लालासके बिना कोई प्राणी है ही नहीं । परन्तु इस बातका पता पशु-पक्षियोंको नहीं है । जो मनुष्य पशु-पक्षियोंकी तरह ही जीवन बिता रहे हैं, उनको भी इस बातका पता नहीं है । सभी उस तत्त्वको चाहते हैं । जैसे, कोई भी प्राणी मरना चाहता है क्या ? सभी प्राणी निरन्तर रहना चाहते है—यह ‘सत्’ की चाहना है ! कोई अज्ञानी रहना चाहता है क्या ? सभी जानना चाहते हैं—यह ‘चित्’ की चाहना है । कोई दुःखी रहना चाहता है क्या ? सभी सुखी रहना चाहते हैं—यह ‘आनन्द’ की चाहना है । इस प्रकार सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप परमात्माकी चाहना सभीमें स्वाभाविक है । इसको कोई मिटा नहीं सकता, दूसरी चाहनाएँ जितनी ज्यादा पकड़ रखी हैं, उतनी ही परमात्मप्राप्तिमें देरी लगेगी । दूसरी चाहनाएँ जितनी मिटेंगी, उतनी ही जल्दी परमात्मप्राप्ति होगी । सर्वथा चाहना मिटा दो तो तत्काल परमात्मप्राप्ति हो जायगी ।
राज्यकी चाहना होनेसे ही ध्रुवजीको परमात्मप्राप्तिमें देरी लगी । इस चाहनाके कारण अन्तमें उनको पश्चात्ताप हुआ कि मैंने गलती कर दी ! आप जिन चाहनाओंको पूरी करना चाहते हैं, उन चाहनाओंका आपको पश्चात्ताप होगा और रोना पड़ेगा । अतः परमात्माकी प्राप्तिमें दूसरी लालसा बाधा है—इस बातपर विचार करनेसे दूसरी लालसा मिट जायगी । दूसरी लालसा परमात्मप्राप्तिमें बाधा देनेमें ही सहायता करती है । इससे लोक-परलोकमें किसी तरहका किञ्चिन्मात्र भी फायदा नहीं है । केवल नुकसानके सिवाय और कुछ नहीं है । दूसरी लालसा केवल आध्यात्मिक मार्गमें बाधा डालती है । अगर इससे कुछ फायदा हो तो कोई बताओ कि अमुक लालसासे इतना फायदा हो जायगा । इसमें कोरा नुकसान है । केवल नुकासनकी बात भी आप नहीं छोड़ सकते, तो क्या छोड़ सकते हैं ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

परमात्मा

तत्काल कैसे मिले ?-१



श्रोता—जल्दी-से-जल्दी उद्धार कैसे हो ?

स्वामीजी—हमारा उद्धार हो जाय—यह एक ही लालसा हो जाय तो तत्काल उद्धार हो जायगा । एक बात आप ध्यान देकर सुनें । संसारका काम जैसे उद्योग करनेसे होता है, ऐसे ही हम समझते हैं कि परमात्माकी प्राप्ति भी उद्योग करनेसे होगी । वास्तवमें यह बात नहीं है, नहीं है, नहीं है ! वे तो सब जगह और सबमें ज्यों-के-त्यों परिपूर्ण हैं । जहाँ आप कहते है हैं कि ‘मैं हूँ’ वहाँ भी परमात्मा पूरे-के-पूरे विद्यमान हैं । अतः केवल लालसा होनेसे उनकी प्राप्ति ही जाती है ।

संसारकी कोई वस्तु केवल लालसासे नहीं मिलती । लालसा होगी, उद्योग करेंगे और भाग्यमें होगा, तभी वस्तु मिलेगी । जैसे, रुपये चाहिये तो रुपयोंकी लालसा हो, रुपयोंके लिये प्रयत्न किया जाय और प्रारब्धमें हो तो रुपये मिलेंगे, अगर प्रारब्धमें न हो तो इच्छा करनेपर और खूब चेष्टा करनेपर भी रुपयें नहीं मिलेंगे । परन्तु परमात्माकी प्राप्ति केवल इच्छासे ही हो जायगी । परमात्मप्राप्तिकी इच्छा होनेपर उद्योग अपने-आप होगा, परन्तु परमात्मप्राप्ति उद्योगके अधीन नहीं है । जो वस्तु उद्योगके अधीन होती है, क्रियाजन्य होती है, वह नाशवान् होती है । जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका विनाश होता ही है । जो साधनासे मिलेगा, वह उत्पत्तिवाला होगा, वह मिट जायगा, रहेगा नहीं । परन्तु परमात्मा अनुत्पन्न तत्त्व है और सदा ज्यों-का-त्यों रहता है; अतः उसकी प्राप्ति केवल लालसासे हो जाती है ।

केवल परमात्माकी ही लालसा हो, दूसरी कोई भी लालसा न हो—

‘एक बानि करुनानिधान की । सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥’
(मानस ३/१०/४)

दूसरी मान-बड़ाई, सुख-आराम आदिकी लालसा होनेसे ही संसारका सम्बन्ध है । दूसरी लालसा मिटने ही संसारका सम्बन्ध छूट जाता है और संसारका सम्बन्ध छूटते ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है । परमात्मा तो पहलेसे ही मिला हुआ है । अन्यकी जो इच्छा है, वासना है, उसीसे संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ है । संसारसे सम्बन्ध जुड़नेके कारण परमात्माका अनुभव नहीं हो रहा है ।

संसारकी इच्छा करके, उद्योग करके कुछ नहीं पा सकोगे । केवल धोखा मिलेगा । परमात्मप्राप्तिसे वञ्चित रह जाओगे—इसके सिवाय और कुछ लाभ नहीं होगा । समय खाली चला जायगा, मनुष्य-शरीर व्यर्थ चला जायगा और मिलेगा कुछ नहीं; क्योंकि संसारका अभाव है । मनुष्यने अपने भीतर एक सिद्धान्त बैठा लिया है कि जो स्थिति अभी नहीं है, वह स्थिति हो जायगी तो हमने बड़ी उन्नति कर ली । यह महान् दोषकी बात है । पहले धन नहीं था, अब धन हो गया तो वह समझता है कि बड़ा भारी काम कर लिया ! लोग भी कहते हैं कि पहले साधारण आदमी था, अब लखपति-करोड़पति बन गया, तो बड़ा भारी काम कर लिया ! यह मुर्ख था, अब पण्डित बन गया, तो बड़ा भारी काम कर लिया ! इसको पहले कोई जानता नहीं था, अब संसारमें इसकी बड़ी प्रसिद्धि हो गयी, तो बड़ा भारी काम कर लिया ! इसका आदर कोई नहीं करता था, सब ठुकराते थे, अब इसका आदर हो गया, तो बड़ा काम कर लिया ! वास्तवमें कुछ नहीं किया है । धूलके दो दाने जितना भी काम नहीं किया है ! जो स्थिति पहले नहीं थी, वह स्थिति अब हो जाय तो अन्तमें वह नहीं रहेगी । जो पहले भी नहीं थी और पीछे भी नहीं रहेगी; उसको प्राप्त करना कोई बहादुरी नहीं है । जो सब देश, काल आदिमें मौजूद है, उस परमात्माको प्राप्त करना ही बहादुरी है । वह परमात्मा सदा ‘है’ ही रहेगा । वह ‘नहीं’ कभी हो ही नहीं सकता ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

सुख-लोलुपताको

मिटानेका उपाय-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)

सुख इतना बाधक नहीं है, जितनी सुखकी लोलुपता बाधक है । सुख मिल जाय, सुख ले लूँ—यह इच्छा जितनी बाधक है, उतना सुख बाधक नहीं है । कारणकी सुख बेचारा आता है और चला जाता है, पर उसकी लोलुपता ज्यों-की-त्यों बनी रहती है । सुख नहीं है तो भी लोलुपता रहती है । सुख भोगते समय भी लोलुपता रहती है और सुख चला जाय तो भी लोलुपता रहती है । सुखमें जो खिंचाव रहता है, प्रियता रहती है, यही वास्तवमें बीमारी है । इसको मिटानेका सरल और श्रेष्ठ उपाय यह है कि दूसरोंको सुख कैसे हो—इसकी लगन लग जाय । आप कृपा करके आज ही इस बातको धारण कर लें कि दूसरोंको सुख कैसे पहुँचे, दूसरोंका भला कैसे हो, दूसरोंका हित कैसे हो । अगर भीतरसे यह लगन लग जायगी कि दूसरोंको सुख कैसे हो तो अपने सुखकी इच्छा छूट जायगी ।

अपनी सुख-लोलुपताको मिटानेके लिये दूसरोंको सुख पहुँचाना है, गायोंको सुख पहुँचाना है, गरीबोंको सुख पहुँचाना है, सबको सुख पहुँचाना है । अपनी सुख-लोलुपताको मिटानेके उद्देश्यसे अगर सेवा की जाय तो मेरा विश्वास है कि जरूर लाभ होगा, करके देख लो । आजकल सेवा करनेवालोंमें भी सच्ची लगनसे सेवा करनेवाले मनुष्य बहुत कम देखनेमें आते हैं । वे सेवा तो करते हैं, पर उसमें दिखावटीपन रहता है । भीतरसे यह लगन नहीं होती कि दूसरोंको सुख कैसे पहुँचे, दूसरोंका हित कैसे हो । गीता कहती है कि जो प्राणिमात्रके हितमें रत रहते हैं, वे भगवान् को प्राप्त होते हैं—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥’ (१२/४) ।

अब दूसरेकी सेवा किस रीतिसे करें, यह बताता हूँ । दूसरेकी सेवा करते समय अपने मनकी प्रधानता बिलकुल न रखें । केवल दूसरेके मनकी तरफ देखें कि वे कैसे राजी हों । किस तरहसे उनको सुख पहुँचे । हमें तो कई वर्षोंके बाद यह बात पकड़में आयी कि ‘मेरे मनकी बात पूरी हो’—यही कामना है । इसलिये अपनी मनमानी छोडकर दूसरेकी मनमानी करें । जो न्याययुक्त हो, शास्त्र-सम्मत हो, अपनी सामर्थ्यके अनुरूप हो—ऐसी दूसरेके मनकी बात पूरी करें, तो आपमें अपनी कामनाको मिटानेकी सामर्थ्य आ जायगी ।

जहाँ रहो, जिस क्षेत्रमें रहो केवल यह लगन रखो कि दूसरेको सुख कैसे मिले, दूसरेका हित कैसे हो । इस बातका ख्याल रखो कि किसीको मेरे द्वारा कष्ट न पहुँचे, सुख पहुँचे । जैसे गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा—‘कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।’ (मानस ७/३० ख); कामीको जैसे स्त्री प्यारी लगती है और लोभीको जैसे पैसा प्यारा लगता है, ऐसे ही आपको दूसरोंका हित प्यारा लगाने लगे । फिर देखो तमाशा, चट काम होगा । वर्षोंतक विचार और चिन्तन करनेपर जो बात मिली है, वह बात बतायी है आपको !

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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